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गुरुवार, 15 अप्रैल, 2004 को 16:42 GMT तक के समाचार
 
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'अब युवाओं को मौक़ा देना चाहिए'
 

 
 
सैम पित्रोदा
सैम पित्रोदा इस समय वर्ल्ड टेल के चेयरमैन हैं
राजीव गाँधी सरकार के मुख्य टेक्नॉलॉजी सलाहकार रह चुके सैम पित्रोदा इन दिनों फिर भारत में हैं और कांग्रेस पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने राजीव गाँधी से अपने संबंधों से लेकर राहुल गाँधी के व्यक्तित्व और टेलीकम्युनिकेशन तक सभी विषयों पर खुली बात की.

उनसे पहला सवाल था कि 20 साल पहले उन्हें राजीव गाँधी भारत लाए थे अब उन्हें अचानक कांग्रेस के लिए प्रचार करने की क्यों सूझी?

सैम पित्रोदा - बीस साल पहले राजीव गाँधी जी ने मुझे देश में काम करने का जो मौक़ा दिया उसने मेरी ज़िंदगी बदल दी. टेलीकम्युनिकेशन से लेकर आईटी तक सभी क्षेत्रों में मैंने काम किया. उन्हीं दिनों राजीव गाँधी से दोस्ती भी हो गई.

इस वक्त मेरा फ़र्ज़ था कि मैं दोस्ती निभाऊँ. राजीव गाँधी ने जो कुछ उस समय किया दरअसल हम उसी का फल खा रहे हैं. उनके पास वो नज़र थी कि वे अपने समय से आगे देख रहे थे. लोगों को तब हंसी आ रही थी कि राजीव क्या बात कर रहे हैं.

राजीव गाँधी की मौत के बाद आप अमरीका वापस लौट गए, क्यों?

एक तो उनकी मौत का दुख था. दूसरा मुझे हार्ट अटैक हुआ और सर्जरी की ज़रुरत पड़ी. मैं तो एक रुपए हर साल लेकर भारत सरकार के लिए काम कर रहा था. उसी समय मेरे बच्चों की पढ़ाई के दिन थे, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरे पास पैसे नहीं थे. तब लगा कि मेरी अपनी निजी ज़िंदगी भी है और मैं लौट गया.

तब के भारत में और अब के भारत में क्या फ़र्क देखते हैं?

बहुत आनंद आता है यह देखकर कि देश में टेलीकॉम की क्रांति हो गई है. लोगों को सुविधाएँ मिल रही हैं. तब देश में बीस लाख फ़ोन थे और अब साढ़े आठ करोड़ फ़ोन हैं. जगह-जगह पीसीओ हैं और मोबाइल कम्युनिकेशन बढ़ गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि अब लोगों के पास इसके बारे में ज्ञान है.

सुनते हैं कि आपने फ़ोन का इस्तेमाल पहली बार तब किया था जब आप अमरीका पहुँच गए, तब यह सब आप कैसे कर पाए?

मैं उड़ीसा के एक छोटे से गाँव टिटलागढ़ में हुआ था, फिर मैं पढ़ने के लिए गुजरात गया और वहाँ से अमरीका. यह सच है कि वहाँ जाकर ही मैंने पहली बार फ़ोन का इस्तेमाल किया.

इसके बाद अपनी एक कंपनी बनाकर हमने कुछ काम किया फिर पैसे बनाने के लिए उसे बेच दिया जिससे उस समय 50 लाख डॉलर का फ़ायदा हुआ. यहाँ आए तो देखा कि यहाँ तो फ़ोन चलता ही नहीं. उसी समय मैंने गाँधी फ़िल्म देखी थी और लगा कि देश के लिए कुछ करना चाहिए.

आपने राजीव गाँधी को भी देखा और आप राहुल को भी जानते हैं दोनों के व्यक्तित्व में आपको कोई समानता दिखती है?

बहुत से मेल दिखते हैं. राहुल पढ़े लिखे हैं, वे सीधे सादे हैं. मैं तो उनकी आँखों में राजीव गाँधी का अधूरा सपना देखता हूँ. दोनों बच्चे अपने पिता को आदर के साथ देखते हुए बड़े हुए हैं. हालांकि मैं प्रियंका को उतने क़रीब से नहीं जानता और राहुल और प्रियंका के व्यक्तित्व में अंतर भी है लेकिन आख़िरकार दोनों भाई-बहन ही हैं.

आप अपने लिए क्या भूमिका देखेते हैं?

मुझे अब किसी भूमिका की ज़रुरत नहीं है. मैं 62 साल का हो गया हूँ और मैंने अपनी पारी खेल ली है. मुझे न तो मंत्री बनना है, न राज्यसभा की सदस्यता चाहिए और न मुझे कांग्रेस का महासचिव बनना है.

अब देश को जवान लोगों की ज़रुरत है. देश में 60 प्रतिशत से अधिक लोग 35 साल से कम उम्र के हैं. उन्हें मौक़ा देना चाहिए.

 
 
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