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गुरुवार, 12 जून, 2008 को 18:01 GMT तक के समाचार
 
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ग्वांतानामो पर बुश प्रशासन को झटका
 
ग्वांतानामो बे शिविर
ग्वांतानामो बे शिविर के बंदियों को लेकर मानवाधिकार के सवाल उठाए जाते रहे हैं
अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा है कि ग्वांतानामो बे में रखे गए विदेशी बंदियों को अमरीकी अदालतों के दरवाज़े खटखटाने का अधिकार है.

इस फ़ैसले के बाद वे अपने बंदी बनाए जाने को अदालतों में चुनौती दे सकते हैं.

अमरीकी सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला अमरीकी प्रशासन को एक बड़ा झटका है.

इस फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा है कि हालांकि वे इस फ़ैसले से सहमत नहीं हैं लेकिन वे इसका पालन करेंगे.

ग्वांतानामो बे में अमरीकी नौसेना का अड्डा है. यहीं बनाए गए एक शिविर में छह साल से क़रीब 270 विदेशी लोगों को बंदी बनाकर रखा हुआ है.

इन लोगों पर चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने या अलक़ायदा या तालेबान के साथ संबंध होने का आरोप है.

अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इन्हीं के विषय में अहम फ़ैसला सुनाया.

इस फ़ैसले के अनुसार ग्वांतानामो बे शिविर में जिन लोगों को रखा गया है वो अब अदालतों में अपने बंदी बनाए जाने को चुनौती दे सकेंगे.

ये फ़ैसला करना आसान नहीं था. लेकिन आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने को चार के मुक़ाबले पाँच मतों से 2006 के क़ानून को पलट दिया.

वर्ष 2006 के क़ानून में ग्वांतानामो बे में बंदी बनाए गए लोगों का न्यायिक समीक्षा कराने का अधिकार समाप्त कर दिया गया था.

बड़ा असर

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसल के कई गंभीर परिणाम होंगे.

पहला यह अभी यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद ग्वांतानामो बे शिविर के बंदियों के मामलों की त्वरित सुनवाई अपने आप शुरू होगी या नहीं.

ग्वांतानामो बे शिविर में बंदी
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दूसरा यह कि अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कहा जा रहा है कि इससे ग्वांतानामो बे स्थित शिविर के बंद होने की स्थिति भी बन सकती है.

और तीसरा असर कई सवालों के रुप में सामने आएगा.

ये माना जाता रहा है कि इस ग्वांतानामो बे के कारण अमरीका की दुनिया में साख गिरी है.

इससे पहले बुश प्रशासन ये कहता रहा है कि ग्वांतानामो चूंकि क्यूबा में है इसीलिए इसमें रखे बंदी अमरीकी क़ानून के अंतर्गत अपील नहीं कर सकते और न ही इन्हें जेनेवा कन्वेंशन के मुताबिक कोई अधिकार हैं.

लेकिन संवाददाता कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद भी ये सवाल उठाया जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में शुरू हुए इस शिविर पर फ़ैसला पूरे छह साल में क्यों सुनाया.

व्हाइट हाउस का कहना है कि वो अभी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का अध्ययन कर रहा है.

 
 
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