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बुधवार, 27 सितंबर, 2006 को 13:13 GMT तक के समाचार
 
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'दक्षिण अफ्रीका अपनी राह भटक रहा है'
 
डेसमंड टुटू
टुटू दक्षिण अफ्रीका में अन्याय के ख़िलाफ़ अक्सर आवाज़ उठाते रहे हैं
शांति का नोबेल पुरस्कार पाने वाले अफ्रीकी आर्चबिशप डेसमंड टुटू ने दक्षिण अफ्रीका की आलोचना करते हुए कहा है कि देश उन आदर्श मूल्यों को बरक़रार रखने में नाकाम रहा है जिन्होंने रंगभेद को ख़त्म किया था.

उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में लोगों के दिलों में क़ानूनों के लिए कोई इज़्ज़त नहीं है और यहाँ तक कि वे जीवन का भी सम्मान नहीं करते.

आर्चबिशप डेसमंड टूटू ने कहा है कि दक्षिण अफ़्रीका में उसी तरह की स्थिति पैदा हो रही है जैसी जाति और नस्लों की लड़ाई से जूझ रहे रवांडा और बोस्निया जैसे देशों की है.

उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में हत्याओं की बढ़ती दर का हवाला दिया, नौ महीने के बच्चों के बलात्कार का उदाहरण दिया और कहा कि उनके देश में ज़िदगी की जो अहमियत थी वो ख़त्म हो रही है.

डेसमंड टूटू का कहना है, "दक्षिण अफ़्रीका में अब उन्हीं बातों को अपनाया जा रहा है जिनका कभी विरोध किया जाता था, मिसाल के तौर पर-भौतिकतावादी रवैया. और अब ये भी लगता है कि हम ज़िदगी के महत्व को भूल रहे हैं."

"दरअसल अब तो ये लगता है कि रंगभेद ने हमें, जितनी आशंका थी उससे कहीं ज़्यादा तबाह किया है."

आर्चबिशप टूटू की ये बातें सतही तौर पर कुछ अजीब सी लगती हैं. दक्षिण अफ़्रीका में शांति है, विकास की गति ठीक है, बेरोज़गारी में कमी आई है और हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि लोग अपने देश के प्रति अभी भी आशावान हैं.

सरकार से नाराज़गी

लेकिन यदि हम सतह को थोड़ा सा कुरेदें तो स्थिति गंभीर नज़र आती है.

अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व वाली सत्ताधारी गठबंधन संकट में नज़र आ रही है.

हाल ही में ट्रेड यूनियन के बड़े सम्मेलन में उपराष्ट्रपति के मंच पर आते ही इतना शोर शराबा हुआ कि उन्हें मंच छोड़ना पडा. वहां आए लोगों ने एक गीत बनाया जिसमें राष्ट्रपति थाबो अंबेकी को कुत्ता कहा गया.

तो ग़लती कहां हुई. कई लोग उस रास्ते पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं जिस राह पर राष्ट्रपति थाबो अंबेकी देश को चला रहे हैं.

वामपंथी दल और मज़दूर यूनियन राष्ट्रीयकरण और समाजवादी मॉडल की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार उदारीकरण और वैश्वीकरण का मॉडल अपना रही है.

अनेक लोगों का कहना है कि रंगभेद ख़त्म होने के बाद ग़रीबों के लिए जितना किया जाना चाहिए था उतना हुआ नहीं और अब लोग चुप बैठने को तैयार नहीं हैं.

तो ये तो काले लोगों की सोच है वहीं गोरे और भारतीय मूल के लोगों में भी उतनी ही कड़वाहट है.

हत्याओं की बढ़ती दर से लोगों को विश्वास हो गया है कि वो उंची चहारदिवारियों के पीछे भी सुरक्षित नहीं हैं.

पिछले दस सालों में जो गोरों की जनसंख्या थी उसका बीस प्रतिशत अब वहां से अपनी संपत्ति बेचकर जा चुका है.

दूसरे समुदायों की युवा पीढ़ी, जिनमें से कईयों का जन्म भी नहीं हुआ होगा जब रंगभेद अपने चरम पर था, उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कत हो रही है क्योंकि काले लोगों के लिए एक तरह के आरक्षण की व्यवस्था है.

तो भले ही दक्षिण अफ़्रीका को देखकर लगता हो कि वहां सूरज चमक रहा है लेकिन सभी समुदाय के लोगों के पास शिकायतें हैं और उनकी शिकायतें और तेज़ होती जा रही हैं.

 
 
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