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बुधवार, 14 सितंबर, 2005 को 16:55 GMT तक के समाचार
 
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नई सुरक्षा परिषद: कुछ सवाल-जवाब
 
संयुक्त राष्ट्र वेबसाइट से घोषणा पत्र की तस्वीर
जी-4 देशों मानते हैं सुरक्षा परिषद दुनिया की 60 साल पुरानी असलियत दर्शाती है आज की नहीं
संयुक्त राष्ट्र संघ की नई सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के दावे को मज़बूत करने के लिए भारत, जापान, जर्मनी और ब्राज़ील ने एक गुट का गठन किया है जिसे जी-4 नाम दिया गया है.

बीबीसी ऑनलाइन ने इससे जुड़े विभिन्न मुद्दों की समीक्षा की है.

सुरक्षा परिषद में परिवर्तन क्यों किया जाए?

सुरक्षा परिषद का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद किया गया और इस युद्ध में विजेता रहे अमरीका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ़्रांस ने वीटो अधिकार सहित इस परिषद में स्थाई सदस्यता ले ली. तब से परिषद में सदस्यों की संख्या 11 से बढ़ कर 15 हो गई है, लेकिन न तो स्थाई सदस्यों की संख्या में परिवर्तन हुआ है और न ही वीटो का अधिकार किसी और को दिया गया है.

कई देशों का मानना है कि परिषद संतुलित नहीं है. संयुक्त राष्ट्र संघ में बड़े स्तर पर किए जाने वाले परिवर्तनों पर विचार किया जा रहा है, उनमें से एक सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन है. पिछले वर्ष महासचिव कोफ़ी अन्नान द्वारा गठित किए गया एक उच्च स्तरीय पैनल इन परिवर्तनों पर विचार कर रहा है. इसकी रिपोर्ट दिसंबर-2006 में आनी है.

ब्राज़ील, जर्मनी, भारत और जापान ने एक गुट का गठन क्यों किया है?

इन देशों ने जी-4 नाम के गुट का गठन सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट के लिए संयुक्त रुप से अपना दावा प्रस्तुत करने के लिए किया है. यह गुट एक अफ़्रीकी देश को भी स्थाई सीट दिए जाने की बात कह रहा है.

ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला
ब्राज़ील भी जी-4 का दमदार सदस्य है

एक दूसरे का सहयोग करके यह देश अपने दावे को मज़बूती दे रहे है. गुट का गठन करने से इन देशों का दावा और उम्मीदवारों देशों की तुलना में भारी रहेगा.

इन देशों का कहना है कि इनके आकार और प्रतिष्ठा को देखते हुए वे सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट के हक़दार हैं. इनका कहना है कि सुरक्षा परिषद को 21वीं सदी के अंतरराष्ट्रीय समुदाय की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए.

इनका आगे कहना है कि इनके पास अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा जैसी बड़ी ज़िम्मेदारियों का भार उठाने की क्षमता और इच्छाशक्ति है.

इन देशों के अलग अलग रुप से मामले क्या हैं?

ब्राज़ील - इस समय सुरक्षा परिषद में किसी दक्षिण अमरीकी देश की कोई सीट नहीं है और ब्राज़ील का कहना है कि वो इस स्थान के लिए सबसे उपयुक्त है. उसके बड़े व्यापारिक हित है और उसका मानना है कि विकासशील देशों की ज़रूरतों पर अधिक ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है.

जर्मनी - जर्मनी का मानना है कि उसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद काफ़ी प्रायश्चित कर लिया है. एक आर्थिक महाशक्ति होने के नाते वो विश्व मंच पर जगह की योग्यता रखता है. उसका एक विशेष तर्क यह है कि वो संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए बड़ी मात्रा में योगदान करता है.

जापान - जापान का भी कहना है कि वो संयुक्त राष्ट्र संघ के कोष के लिए बहुत बड़ा योगदान करता है. लेकिन इसके परे वो अपने लिए एशियाई महाशक्ति होने के नाते एक अलग भूमिका देखता है, और जर्मनी की तरह ही अपने सैन्य इतिहास से उपर उठ चुका है.

जापान के प्रधानमंत्री कुईज़ोमी
जापान अपनी अर्थव्यवस्था के आधार पर दावेदार है

भारत - काफ़ी समय से भारत की महत्वाकांक्षा एक क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की रही है. उसका मानना है कि वो भी विश्व स्तर पर कोई भूमिका अदा कर सकता है. भारत के पास परमाणु हथियार होने के बावजूद जी-4 के अन्य तीनों देश भारत की दावेदारी का समर्थन करने से पीछे नहीं हटे हैं. इन तीनों देशों के पास भी परमाणु हथियार मौजूद हैं.

स्थाई सीट के लिए किस और देश का दावा बनता है?

इस बात के लिए एकराय बनती नज़र आ रही है कि अफ़्रीका को भी परिषद की स्थाई सीट मिलनी चाहिए. दक्षिण अफ़्रीका और नाइजीरिया इसके स्वाभाविक उम्मीदवार हैं.

तंज़ानिया भी अपनी दावेदारी पेश कर रहा है. मिस्र भी एक अफ़्रीकी देश है लेकिन उसे आसानी से मध्य-पूर्व से प्रतिनिधित्व का दावेदार माना जा सकता है.

एशिया में इंडोनेशिया की भी संभावना बनती है. यही बात आस्ट्रेलिया के लिए भी कही जा सकती है. अर्जेंटीना और मैक्सिको का तर्क है कि उन्हें भी दक्षिण अमरीका की और से दावेदार माना जानी चाहिए.

परिषद में किसी इस्लामी देश का न होना ध्यान आकर्षित करता है और इस संबध में विचार किए जाने की ज़रुरत है.

क्या जी-4 देशों को विरोध का सामना करना पड़ सकता है?

चूँकि स्थाई सीट के लिए और भी कई दावेदार हैं, तो कहा जा सकता है कि हाँ, जी-4 को विरोध का सामना करना पड़ सकता है. उदाहरण के लिए यूरोप में इटली ने जर्मनी को सीट दिए जाने का विरोध किया है.

यूरोपीय संघ के कुछ देशों का कहना है कि ब्रिटेन और फ़्रांस को अपनी सीटें छोड़ देनी चाहिए और यूरोपीय संघ के लिए एक ही सीट होनी चाहिए. अमरीका के कुछ दक्षिणपंथी कंजरवेटिव्स को यूरोपीय शक्ति को एक और सीट देने को लेकर चिताएँ हैं.

अमरीका जापान का समर्थन करता है लेकिन सुरक्षा परिषद में एक और एशियाई शक्ति को ले कर उसकी अपनी चिंताएँ हैं. पाकिस्तान भारत को स्थाई सदस्यता दिए जाने को ले कर ख़ुश नहीं है.

क्या परिषद के नए सदस्यों को वीटो का अधिकार दिया जाएगा?

शायद नहीं और पुराने सदस्य वीटो के अपने अधिकार को पुर्नगठन की क़ीमत के रुप में अपने पास रखेंगे. संयुक्त राष्ट्र संघ के पुर्नगठन में सौदेबाज़ी भी होगी इसलिए यह सोचना काल्पनिक ही होगा कि वीटो के अधिकार में कुछ परिवर्तन होंगे.

अफ्रीकी देशों के नेता
कुछ अफ्रीकी देश भी दावेदार हैं

लेकिन आने वाले समय में परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ कर लगभग 25 हो जाएगी जिससे बेहतर भौगोलिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व दिया जा सकेगा.

बड़े पैमाने पर संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधारों का क्या होगा?

आशंकाओं, चुनौतियों और बदलाव के लिए बनाए उच्च स्तरीय पैनल की रिपोर्ट इस वर्ष दिसंबर-2006 में आनी है. इसका गठन पिछले वर्ष कोफ़ी अन्नान ने किया था जब उन्होंने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ एक दोराहे पर खड़ा है.

यह कहना उचित होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ को नई चुनौतियों को पहचानने और उनका सामना करने के लिए और तत्पर होना चाहिए. ये चुनौतियाँ आंतकवाद और भारी विनाश के हथियार ही न हों, जो कि पश्चिमी देशों से संबधित हैं बल्कि ग़रीब देशों की चुनौतियाँ जैसे स्वास्थ्य और व्यापार भी इसमें शामिल होनी चाहिएँ.

प्रमुख मुद्दा ये है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के मामलों में और आसानी से हस्तक्षेप कर पाएगा. इस मामले में वो पहले असफल रहा है जैसे कि रवांडा में जनसंहार रोकने का मामला. कनाडा की एक रिपोर्ट में दिया गया विचार ‘सुरक्षा का उत्तरदायित्व’ कुछ ज़ोर पकड़ रहा है.

इसमें कहा गया है कि टाली जा सकने वाली आपदा से अपने नागरिकों को बचाने का उत्तरदायित्व शासक राष्ट्र का है. लेकिन जब वो राष्ट्र ऐसा कर सकने में असमर्थ हो या करने की इच्छा न रखता हो तो इस उत्तरदायित्व को राष्ट्रों के विस्तृत समूह को उठाना चाहिए.

 
 
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