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शुक्रवार, 29 अप्रैल, 2005 को 13:17 GMT तक के समाचार
 
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चुनाव में स्विंग सीटों का चक्कर
 
इराक़ का मुद्दा स्विंग सीटों में छाया रह सकता है
ब्रिटेन के चुनावों में इस बार कई ऐसी सीटें हैं जिनके परिणाम के बारे में कोई भी स्पष्ट रुप से कुछ कहने में हिचक रहा है क्योंकि इन सीटों के मतदाताओं ने अभी वोट के बारे में कुछ तय नहीं किया है.

इन सीटों को स्विंग या मार्ज़िनल सीट कहा जा रहा है और राजनीतिक दलों ने इन सीटों को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.

इन “स्विंग सीटों” को जीतने में विदेशी मूल के मतदात ख़ासकर एशियाई मतदाता ब्रिटेन के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

इस चुनाव में लगभग पचास ऐसी सीटें हैं जिनमें पिछले चुनाव में कंज़रवेटिव पार्टी , लेबर पार्टी से दस प्रतिशत से कम अंतर से हारी थी, और इन सीटों पर ही सबसे ज़्यादा ध्यान है कंज़रवेटिव पार्टी.

कंज़रवेटिव पार्टी नेता और कंज़रवेटिव पार्लियामेंटरी फ़्रेंड्स ऑफ़ इंडिया के संस्थापक सदस्य प्रेमदत्त शर्मा मानते हैं कि सारा मामला इन्हीं पचास से साठ सीटों का है.

वो कहते हैं “हमारी कोशिश है कि सारे ऐसे मतदाताओं को पार्टी में वापिस लाया जाए जो पिछले दो चुनाव में हमारी पार्टी को छोड़कर लेबर के वोटर बन गए हैं. इसके लिए हम चिट्ठियाँ भेजकर, समाचार तंत्रों के माध्यम से या फिर रैली या व्यक्तिगत तौर पर मिलकर उन्हें वापिस आने के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं.”

शर्मा का दावा है कि जो लोग पार्टी छोड़कर लेबर की तरफ़ गए थे उनमें से कई अब लौट रहे हैं.

साथ ही उनका कहना है कि इन पचास सीटों पर उनके दल ने जो अध्ययन कराया है उससे उन्हें जानकारी मिली है कि इस बार मतदाताओं का ध्यान है कई स्थानीय मुद्दों पर और वर्तमान सरकार के उनपर ध्यान न देने पर उनमें ख़ासी नाराज़गी भी है जिसका फ़ायदा उन्हें मिल सकता है.

इसके अलावा कंज़रवेटिव पार्टी ने अपनी नीति में एक बड़ा परिवर्तन किया है.

इराक़ के मसले पर मुस्लिम बहुत नाराज़ है

जो कंज़रवेटिव पार्टी किसी समय सिर्फ़ ब्रिटिश मूल के लोगों और देश की मुख्यधारा के मतदाताओं की पार्टी मानी जाती थी, उसने इस बार सबसे ज़्यादा अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट दिया है.

इस बार लेबर ने 646 सीटों में से 32 अल्पसंख्यकों या विदेशी मूल के लोगों को टिकट दिया है, लिबरल डेमोक्रैट्स ने 40 को.

इसके मुक़ाबले कंज़रवेटिव पार्टी ने जहाँ पिछली बार 15 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट दिया था वहीं इस बार उसने सबसे ज़्यादा 41 विदेशी मूल के लोगों को उम्मीदवार बनाया है.

कंज़रवेटिव इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि उनके वरिष्ठतम नेता माइकल हावर्ड ख़ुद अल्पसंख्यक हैं – एक यहूदी हैं.

लेबर पार्टी

लेबर पार्टी को भरोसा है कि अपने अब तक के काम के आधार पर उनकी जीत निश्चित है, ख़ासकर उस स्थिति में कंज़रवेटिव पार्टी को जीत के लिए.

अगले डेढ़ हफ़्ते में लगभग दस प्रतिशत तक मतदाताओं का रुझान अपनी और ख़ीचना होगा जितना कि ब्रिटेन के इतिहास में आज तक नहीं हुआ.

लेबर पार्टी नेता और बर्मिंघम के वर्तमान सांसद और प्रत्याशी ख़ालिद महमूद का कहना है कि इराक़ के कारण कई मुसलमान मतदाता नाराज़ ज़रूर हैं लेकिन अब लेबर उन्हें समझाने की कोशिश कर रही है .

वो कहते हैं कि सद्दाम के हटने के बाद आम इराक़ी का फ़ायदा ही हुआ है और लेबर के ज़रिए अन्य मुसलमान बहुल देशों का फ़ायदा किया जा सकता है.

उनकी राय में ये तो लगभग तय नज़र आ रहा है कि लेबर अन्य दलों से इतनी आगे है कि अब शायद ही कोई उसके आसपास भी आ पाए.

इन दावों के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि स्विंग सीटों पर इराक़ के मुद्दे को लेकर लेबर पार्टी ख़ासी परेशान है.

ब्रिटेन के कुछ मुसलिम नेताओं का दावा है मुसलमान मतदाता कम से कम चालीस सीटों पर इराक़ और ग्वांतानामों बे जैसे मुद्दों पर वोट डालकर वहाँ के लेबर नेता को हराने की स्थिति में हैं.

इसी के चलते लेबर के कई वरिष्ठ नेता किसी तरह अपनी सीट बचाने की क़वायद में लगे हुए हैं जिनमें शामिल हैं ब्लैकबर्न से खड़े वर्तमान विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ, डर्बी साउथ की प्रत्याशी पर्यावरण मंत्री मार्गरेट बेकेट और ईस्ट हैम से खड़े ऊर्जा मंत्री स्टीफ़न टिम्स.

लिबरल डेमोक्रेट

लिबरल डेमोक्रेट के नेता और पार्टी की 15 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रमेश दीवान कहते हैं कि “स्विंग सीटों” ने ध्यान खींचा है एशियाई मूल के वोटरों की ओर

दीवान कहते हैं “दो सीटें ऐसी हैं जहाँ वर्तमान लिबरल डेमोक्रैट सांसद हैं. यहाँ एशियाई वोटर तीस प्रतिशत से ज़्यादा है. लेस्टर साउथ से परमजीत सिंह गिल खड़े हैं जहाँ एशियाई वोटर 40 प्रतिशत हैं. ब्रेंट में 50 प्रतिशत मतदाता एशियाई हैं. ये सिर्फ़ उदाहरण हैं. कई सीटें ऐसी हैं जिनमें 25 प्रतिशत एशियाई मतदाता हैं.”

दीवान का दावा है कि इन सीटों पर दो ख़ास मुद्दे हैं – विदेशी मूल के लोगों का और शरणार्थियों का – जिसे कंज़रवेटिव उठा रहे हैं. और दूसरा इराक़ का जिसको लेकर लेबर पार्टी मुसीबत में है.

लिबरल डेमोक्रैट कहते हैं कि इन मुद्दों पर मतदाता उन्हें ही वोट देंगे और स्विंग सीटों में उन्हें फ़ायदा होगा

 
 
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