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शनिवार, 16 अप्रैल, 2005 को 06:49 GMT तक के समाचार
 
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जापान ने प्रदर्शनों के लिए चीन को कोसा
 
शंघाई में प्रदर्शन
शंघाई में प्रदर्शनकारियों ने जापान के वाणिज्यिक दूतावास पर पत्थर भी फेंके
जापान ने चीन में पिछले कुछ अर्से से जारी जापान विरोधी प्रदर्शनों पर चीन सरकार की कड़ी निंदा की है.

जापान के विदेशमंत्री नोबुताका माचिमुरा ने प्रदर्शनों को रोक पाने में नाकाम रहने के लिए चीन सरकार की आलोचना की है.

वे रविवार को चीन की यात्रा कर रहे हैं और उन्होंने कहा है कि वे चीन के विदेश मंत्री से इस बारे में बात करेंगे और हिंसक प्रदर्शनों में हुए नुक़सान की भरपाई की माँग करेंगे.

ताज़ा घटनाक्रम में अब चीन के प्रमुख शहर शंघाई में हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किए हैं.

ये प्रदर्शन जापान में स्कूल की नई पाठ्यपुस्तकों के विरोध में हो रहे हैं जिनमें कहा जा रहा है कि युद्ध के समय जापान के अत्याचारों को कम आँका गया है.

साथ ही प्रदर्शकारी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के जापान के दावे से भी नाराज़ हैं.

शंघाई और बीजिंग

शनिवार को जापान विरोधी नारे लगाते हुए और चीन के झंडों के साथ प्रदर्शनकारियों ने शंघाई में जापान के वाणिज्यिक दूतावास के बाहर प्रदर्शन किए और वहाँ पत्थर फेंके.

प्रदर्शन पुलिस की ओर से रैली नहीं करने की चेतावनी दिए जाने के बावजूद हुए.

शहर में कुछ दूकानें और जापानी भाषा में लिखे हुए बोर्डों-तख़्तियों पर भी हमले हुए.

उधर चीन की राजधानी बीजिंग में सुरक्षाकर्मियों ने एक बड़ा अभ्यास किया है.

भी एक ऐसी ही रैली होनेवाली है जिसके लिए भारी सुरक्षा की गई है.

ये रैली शहर के प्रमुख स्थल तिएनेनमन स्क्वायर में होनेवाली है और वहाँ बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं.

जापानी दूतावास के बाहर अतिरिक्त सुरक्षा बरती गई है.

विवाद

चीन में जापान का विरोध कुछ नई जापानी पाठ्यपुस्तकों को लेकर हो रहे हैं.

विरोधी इस बात से नाराज़ हैं कि एक किताब में चीन के नानजिंग शहर में 1937 में जापानी सैनिकों के हाथों 2,50,000 नागरिकों की हत्या को एक 'घटना' बताया गया है जबकि अन्य जगहों पर इसे 'नरसंहार' कहा जाता है.

वे ये भी कह रहे हैं जापानी सैनिकों के व्यापक पैमाने पर एशियाई महिलाओं को यौन ग़ुलाम बनाए जाने की भी लीपापोती की गई है.

उधर जापान कह रहा है कि पुस्तकों को छापने की ज़िम्मेदारी निजी कंपनियों की थी ना कि सरकार की और ये स्कूलों की ज़िम्मेदारी है कि वे कौन-सी पुस्तकें पाठ्यक्रम में रखना चाहते हैं.

 
 
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