राख की ढेर से सोमालिया का 'पुनर्जन्म'

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आम तौर पर स्वतंत्र देशों में हिंसा और युद्ध की ख़बरें सुर्खियां बनती हैं लेकिन जहाँ आए दिन हिंसा हो रही हो और आंतरिक युद्ध जारी हो, वहां अगर शांति का माहौल बनने लगे तो ये एक बड़ी ख़बर होती है.
तो विफल राज्य कहे जाने वाले अफ़्रीकी देश सोमालिया में अगर शांति का वातावरण बनता नज़र आता हो तो भला ये सुर्ख़ियों में कैसे न हो. इसकी कुछ मिसालें दी जा सकती हैं.
- पिछले महीने 20 साल बाद अमरीका ने सोमालिया में अपना दूतावास फिर से खोला
- पिछले साल अक्टूबर में राजधानी मोगादिशु में देश की पहली कैश मशीन खुली.
- कुछ समय पहले मोगादिशु की कुछ प्रमुख सड़कों पर बिजली के खम्भों से जगमगाते बल्ब लगे. इससे पहले तक रात में सड़कों पर अँधेरा छाया रहता था.
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अगर समय की सुई को पीछे ले जाएं तो 2012 में सोमालिया को 20 साल में पहली बार अपनी केंद्रीय सरकार मिली. इसकी संसद बहाल हुई और इसे एक नया संविधान मिला.
सोमालिया में अब बंदूकें खामोश हो गई हैं. बम धमाकों की ज़ोरदार आवाज़ें धीमी पड़ती जा रही हैं. देश में शांति वापस लौट रही है. और आजकल यही विषय वहां सुर्ख़ियों में है.
इसके विपरीत 25 साल पहले सोमालिया में अफरा-तफरी का आलम था. मिलिशिया की बंदूकों का जंगल राज था और अलग अलग क़बीलों की आपसी लड़ाई गृहयुद्ध में बदल गई थी.
जितने लोग बंदूकों से मर रहे थे उससे अधिक अकाल और भुखमरी से. इसे एक विफल राज्य का दर्जा दे दिया गया था.
ज़बरदस्त युद्ध

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ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना की मदद के लिए मोगादिशु गई. अमरीकी सेना को वहाँ एक भयंकर घटना का सामना करना पड़ा.
वो चार अक्टूबर 1993 का दिन था. अमरीकी रेंजर्स और सोमालिया की मिलिशिया के बीच ज़बरदस्त युद्ध छिड़ गया.
एक खतरनाक मिलिशिया लीडर जनरल आइदीद के लड़ाकुओं ने राजधानी मोगादिशु में दो बड़े अमरीकी हेलीकॉप्टर गिरा डाले जिसमें 18 अमरीकी सैनिक मारे गए.
इससे अमरीकी प्रशासन हिल गया. उस दिन की घटना को अमरीकी सेना के इतिहास में एक काले दिन की तरह से याद किया जाता है.
कासिम की कहानी

उस युद्ध में घबराए अमरीकी सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं जिनसे सैकड़ों आम शहरी मारे गए. अमरीका ने अपने फ़ौजी वापस बुला लिए.
सोमालिया एक संकट से दूसरे संकट की तरफ बढ़ता चला गया. हज़ारों नागरिक मारे गए और लाखों देश छोड़ कर भाग गए.
देश छोड़ने वालों की संख्या क़रीब 20 लाख बताई जाती है. इनमें 35 वर्षीय कासिम ईसा भी थे जिन्होंने 1500 सोमाली नागरिकों के साथ भारत में पनाह ले ली.
वहां के जीवन को याद करते हुए वो कहते हैं, "कुछ बंदूकधारियों ने हमें मारा. हमारी जायदाद छीन ली. उन्होंने हमारे बहन-भाइयों को बार डाला. हमारे माता पिता को मार डाला. हमारे छह भाई बहन थे. केवल मैं ज़िंदा हूँ. एक बहन लापता है."
बंदूकधारियों का राज

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कासिम बताते हैं, "मुझे नहीं मालूम कि वो ज़िंदा है या मारी गई. मैं दूसरे शहर में था. जब मैंने ये खबर सुनी तो मैं बहुत परेशान हुआ. बहुत दुखी हुआ. मैं कई रात सो नहीं पाया. मैं इस घटना को कभी भुला नहीं सकता."
कासिम की कहानी सोमालिया के लाखों लोगों की कहानी है. इस लंबी जंग में किसी के परिवार वाले मारे गए तो कोई अनाथ हो गया तो कोई बेघर.
उनका कहना है कि उनके पास दो विकल्प थे, सोमालिया में रह कर मौत को गले लगाना या फिर देश से बाहर जाकर केवल ज़िंदा रहने की कोशिश करना.
उन्होंने ज़िंदा रहने के लिए देश छोड़ा और भारत आ गए. बंदूकधारियों के राज में सोमालिया और भी अंधकार में चला गया.
उम्मीद की किरण

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दुनिया सोमालिया को ये समझ कर भूल गई कि अब इस देश को टूटने से कोई नहीं बचा सकता. सरकार की अनुपस्थिति में अल-शबाब नामक चरमपंथी संगठन उभरा जिसने पूरे देश में दहशत मचाई.
एक धर्म (इस्लाम), एक ज़बान, एक संस्कृति और एक नस्ल वाला देश सोमालिया तबाह हो गया. क्यों?
कासिम कहते हैं, "ये हमारी लीडरों की ग़लतियों का नतीजा है. ये हमारे पूर्वजों की ग़लतियों का परिणाम है. भ्रष्टाचार, बेईमानी, क़बीलों की अकड़ से देश बर्बाद हुआ. मुझे अफ़सोस है हम देश से बाहर अपने लीडरों के कारण बेकार की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं."
सामान्य जीवन

लेकिन अब एक उम्मीद की एक किरण जागी है. मोगादिशु में कैफ़े, रेस्तरां और इंटरनेट कैफ़े दोबारा खुल रहे हैं.
बिजली बहाल हो चुकी है. सड़कें दोबारा बन रही हैं. स्कूल और कॉलेज फिर से खुल रहे हैं. सामन्य जीवन बहाल हो रहा है. कासिम वापस देश लौटने के लिए बेचैन हैं.
कासिम आपने देश लौट कर शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं. और वो अपने 'दूसरे घर' यानी भारत को अपनी यादों में हमेशा क़ैद कर के रखने की ख्वाहिश रखते हैं.
वो चाहते हैं कि शांति इतनी ज़बरदस्त बनी रहे कि ये एक सामान्य बात हो जाए. फिर शांति सुर्खियां नहीं बनेंगी.
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