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अफ़ग़ानिस्तान: भूख और ग़रीबी से जूझते लाखों लोग और एक देश के 'नरक' बन जाने का ख़तरा
- Author, जॉन सिंपसन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, बामियान (मध्य अफ़ग़ानिस्तान)
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
अफ़ग़ानिस्तान की बड़ी आबादी पर भुखमरी का ख़तरा मंडरा रहा है.
देश का मौसम बदल रहा है. तापमान तेज़ी से नीचे जा रहा है. कई क्षेत्रों के सूखे की चपेट में आने की ख़बरें मिल रही हैं. इससे बड़े नुक़सान की आशंका जताई जा रही है.
राजधानी काबुल से क़रीब 80 किलोमीटर पश्चिम में मैदान वरदक नाम की जगह पर अनाज बांटने के एक केंद्र से आटा लेने के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई. यह आटा संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफपी) की ओर से बांटा जा रहा था.
तालिबान लड़ाकों ने वहां जमा भीड़ को काफी हद तक शांत रखा हुआ था. लेकिन जिन लोगों को बताया गया कि वे आटा पाने के क़ाबिल नहीं है, वो नाराज़ थे और साथ ही डरे हुए भी थे.
एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बताया, "यहां सर्दी आ चुकी है. मुझे नहीं पता कि अगर मैं रोटी नहीं बना सका तो कैसे रहूंगा?"
अफ़ग़ानिस्तान के 2.2 करोड़ से अधिक लोगों को भूख से बचाने के लिए डब्ल्यूएफपी को अनाज की आपूर्ति बढ़ानी होगी. यदि देश का मौसम उतना ही ख़राब हो जाए, जैसा कि विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे हैं, तो अफ़ग़ानिस्तान में गंभीर भुखमरी और अकाल का ख़तरा पैदा होने की आशंका है.
'दुनिया का सबसे गंभीर संकट'
डब्ल्यूएफपी के कार्यकारी निदेशक डेविड बेस्ली रविवार को काबुल के दौरे पर थे. मैंने अफ़ग़ानिस्तान के संकट को लेकर उनसे बात की. देश के हालात को लेकर उनके अनुमान चिंता बढ़ाने वाले थे.
बेस्ली ने कहा, "यहां के हालात आप जितना सोच सकते हैं, उससे ज़्यादा बुरे हैं. वास्तव में, हम अब धरती के सबसे ख़राब मानवीय संकट पैदा होने के ख़तरे को देख रहे हैं.''
उन्होंने बताया, "यहां के 95 फ़ीसदी लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं हैं. हम यहां के 2.3 करोड़ लोगों को भुखमरी की ओर बढ़ते हुए देख रहे हैं. देश के लिए अगले 6 महीने विनाशकारी होने वाले हैं. ये देश पृथ्वी पर नरक बनने जा रहा है."
अगस्त में तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में आने से पहले, माना जा रहा था कि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद से सर्दियों के दौरान आने वाले ख़तरे से निपट लेगी. लेकिन जब उनकी सरकार गिर गई तो मदद मिलने का भरोसा भी गायब हो गया.
पश्चिमी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को मदद पर रोक लगा दी है. वे एक ऐसे शासन की मदद नहीं करना चाहते, जो लड़कियों को शिक्षा हासिल करने से रोके और देश में शरिया क़ानून फिर से लागू करे.
लेकिन पश्चिमी देश क्या अब भी अपने रुख़ पर कायम रहेंगे और अफ़ग़ानिस्तान के लाखों निर्दोष लोगों को भूख से मरने देंगे?
डेविड बेस्ली ने दुनिया के तमाम देशों और अमीर मुल्कों के अरबपतियों से अफ़ग़ानिस्तान की तत्काल मदद करने की अपील की है.
उन्होंने कहा है, "दुनिया के नेताओ और अरबपतियो!: कल्पना करें कि आपकी छोटी बेटी या आपका छोटा बेटा या आपका पोता भूख से तड़प रहा हो. तो आप वो सब कुछ करते, जो कर सकते हैं. आज जब पृथ्वी पर 400 लाख करोड़ डॉलर की संपत्ति है, हमें इस हाल के लिए अपने आप पर शर्म आती है."
वो आगे कहते हैं, "हम किसी बच्चे को भूख से मरने देते हैं तो हमें अपने आप पर शर्म आती है. मुझे परवाह नहीं है कि वो बच्चा कहां का रहने वाला है."
बामियान की फ़ातिमा का हाल
मध्य अफ़ग़ानिस्तान के बामियान में तालिबान ने 2001 में चट्टानों पर छठी सदी में तराशी गई बुद्ध की प्राचीन और सुंदर मूर्तियों को बर्बाद कर दिया था.
उसी बामियान शहर में हम फ़ातिमा नाम की एक विधवा और तीन से 16 साल की उम्र के उनके सात बच्चों से मिले. कुछ समय पहले ही पेट के कैंसर से उनके पति की मौत हो गई. वे सब बेहद गरीब हैं. वो नष्ट कर दी गईं बुद्ध मूर्तियों में से एक के पास मौजूद एक गुफा में रहते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान की पिछली सरकार के दौरान फ़ातिमा को आटा और तेल नियमित तौर पर मिलता था, लेकिन तालिबान ने उस पर रोक लगा दी.
फ़ातिमा एक किसान के खेतों की निराई-गुड़ाई करके कुछ पैसे कमा लेती थीं. लेकिन अब गंभीर सूखे से जूझ रहे इस इलाक़े में बहुत कम ही फसल बची है. ऐसे में उनके पास कोई काम नहीं है.
वो कहती हैं, "मुझे डर लग रहा है. मेरे पास बच्चों को खिलाने के लिए कुछ नहीं है. जल्द ही मुझे कहीं जाकर भीख मांगनी पड़ेगी."
कई मां-बाप ने शादी के लिए अपनी बेटियों को बड़ी उम्र के मर्दों के हाथों बेच दिया है. लेकिन फ़ातिमा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है. लेकिन जब तक खाने-पीने के सामान की आपूर्ति फिर से बहाल नहीं होती, वो और उनके बच्चे खाने के लिए तरसते रहेंगे.
अब पास के पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमने लगी है और हवा भी चुभने लगी है. अब बहुत जल्द ही यहां सर्दी आ जाएगी और तब फ़ातिमा और उनके परिवार जैसे लाखों लोग तबाही के कगार पर पहुंच चुके होंगे.
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