नेपाल में नई सरकार के गठन पर क्या चल रहा है?
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- Author, संजय ढकाल
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी नेपाली सेवा
सोमवार को संसद में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली विश्वास मत हार गए. इसके बाद अब देश में नई सरकार बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक़, नई सरकार बनाने का मामला अब पहले से अधिक उलझ गया है.
सोमवार को केपी शर्मा ओली के संसद में बहुमत साबित करने में नाकाम रहने के बाद राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने सभी राजनीतिक पार्टियों को कहा कि वे गुरुवार रात नौ बजे तक नई सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती हैं.
राष्ट्रपति ने कहा है कि नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76(2) के मुताबिक़, नई सरकार बनाने के लिए दो या इससे ज़्यादा पार्टियाँ संसद में अपनी संख्याबल के आधार पर सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती हैं.
सोमवार को क्या हुआ?
नेपाली संसद में मौजूद कुल 232 सांसदों में से 124 ने केपी शर्मा ओली के ख़िलाफ़ वोट दिया और ओली विश्वास मत साबित नहीं कर पाए.
ओली के समर्थन में सिर्फ़ 93 वोट पड़े जबकि 15 सांसदों ने तटस्थ रहने का विकल्प चुना.
नेपाल की संघीय संसद में ओली की सत्तारुढ़ सीपीएन-यूएमएल के 121 वोट हैं. लेकिन पार्टी में अंदरुनी विवाद चल रहा था और इस वजह इसके एक धड़े ने संसदीय कार्यवाही में हिस्सा ही नहीं लिया. इस धड़े का नेतृत्व दो पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और झलनाथ खनाल कर रहे हैं.
संघीय संसद में मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस और तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ खड़ी थीं.
हालाँकि 32 वोटों वाली जनता समाजबादी पार्टी विश्वास मत पर वोटिंग के मामले में बँटी दिखी. पार्टी का महंत ठाकुर वाले धड़े ने तटस्थ रहने का फ़ैसला किया, जबकि उपेंद्र यादव की अगुआई वाले धड़े ने ओली के ख़िलाफ़ वोटिंग की.
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अब मौजूदा संसद की क्या स्थिति है?
नेपाल की संघीय संसद में इस वक्त 271 सदस्य हैं. सरकार बनाने के प्रस्ताव को समर्थन देने के लिए 136 सांसदों को ज़रूरत होगी.
ओली की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के 121 सांसद हैं.
मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस के 63 सांसद हैं (दो सदस्य निलंबित किए जा चुके हैं, इसलिए वो वोट नहीं दे सकते).
इसी तरह पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' की अगुआई वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) के 49 सांसद हैं.
चौथी सबसे बड़ी पार्टी जनता समाजबादी पार्टी के पास संसद में 34 सीटें हैं (इसके भी दो सांसद निलंबित किए जा चुके हैं).
ऐसे में सरकार बनाने के लिहाज़ से जनता समाजबादी पार्टी की भूमिका काफ़ी अहम हो सकती है.
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नई सरकार बनाने का मामला इतना पेचीदा क्यों?
भले ही नेपाली कांग्रेस और माओवादी केंद्र साफ़ तौर पर कार्यवाहक सरकार के ख़िलाफ़ हैं और नेपाली कांग्रेस के प्रमुख (सभापति) शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में नई सरकार बनाने के लिए ज़ोर लगा रहे हैं.
लेकिन जनता समाजबादी पार्टी बँटी हुई लग रही है. नेपाली कांग्रेस और माओवादी केंद्र के कुल मिलाकर संसद में 110 सीटें बनती हैं. इसका मतलब उन्हें सिर्फ़ और 26 वोटों की ज़रूरत है.
चूंकि सोमवार को ओली सरकार के ख़िलाफ़ जनता समाजबादी पार्टी के 15 सांसदों ने वोट दिया था. इसलिए ऐसा लगता है कि इतने वोट नई सरकार बनाने के पक्ष में पड़ने चाहिए.
इसका मतलब ये कि जनता समाजबादी के सेंट्रल कमेटी के प्रेसिडेंट उपेंद्र यादव की अगुआई वाले इस धड़े का समर्थन मिलने से देउबा के समर्थन में 125 सांसदों के वोट हासिल हो जाएंगे. फिर भी वह सरकार बनाने के लिए ज़रूरी वोट हासिल करने से दूर ही रहेंगे.
दूसरी ओर जनता समाजबादी पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष महंत ठाकुर की अगुवाई वाले धड़े ने एक बयान जारी कर वैकल्पिक सरकार बनाने से दूर ही रहने का संकेत दिया है. उनके धड़े के सांसद (इनमें से 15 सांसद सोमवार को विश्वास मत के दौरान तटस्थ रहे थे) नई सरकार के लिए अपना समर्थन नहीं भी दे सकते हैं.
संसद में चार सीटें छोटी पार्टियों और निर्दलीय सदस्यों की है.
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आख़िर इस हालात में नई सरकार बनाना कैसे संभव है?
यह संभव हो सकता है. नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी में अंदरूनी फूट नई सरकार बनाने में मददगार साबित हो सकती है.
सोमवार को संसद में विश्वास मत के दौरान वोटिंग में पार्टी के 28 सांसदों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे संसद की कार्यवाही के दौरान वहां मौजूद थे.
सांसदों के इस धड़े की अगुआई दो पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और झलनाथ खनाल कर रहे हैं. पार्टी में अंदरुनी विवाद की वजह से इन लोगों ने ओली को सांसद के पद से सामूहिक इस्तीफ़ा देने की चेतावनी दी थी. सोमवार को वे सामूहिक इस्तीफ़ा देने भी वाले थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके बजाय वे संसद से ग़ैर-हाज़िर रहे.
मौजूदा हालात में अगर सीपीएन-यूएमएल के माधव कुमार नेपाल और झलनाथ खनाल वाले धड़े के कुछ सांसद इस्तीफ़ा दे देते हैं तो नई सरकार बनाने के लिए ज़रूरी वोटों की संख्या कम हो जाएगी. इससे नेपाली कांग्रेस और माओवादी केंद्र की नई सरकार बनाने की कोशिश कामयाब हो सकती है.
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क्या है विश्लेषकों की राय?
जनता समाजबादी पार्टी के महंत ठाकुर ने अपने बयान में कहा है, "नई सरकार बनाने, गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने या फिर किसी तरह की वैकल्पिक सरकार बनाने में शामिल होना जनता समाजबादी पार्टी के उद्देश्य के ख़िलाफ़ है."
विश्लेषक तुला नारायण शाह कहते हैं, "इसका मतलब यह कि गेंद अब सीपीएन-यूएमएल के असंतुष्ट नेताओं के पाले में है. अगर उनमें से सांसदों की एक निर्धारित संख्या ने इस्तीफ़ा दे दिया तो इससे दूसरी पार्टियों के लिए बहुमत हासिल करना आसान हो जाएगा. वरना किसी भी परिस्थिति में नई सरकार बनाना बेहद पेचीदा मसला साबित होगा."
संविधान विशेषज्ञ भीम अर्जुन आचार्य कहते हैं कि "अगर सांसदों की संख्या (इस्तीफ़े के बाद) कम हो जाती है तो तकनीकी तौर पर बहुमत हासिल करने के लिए ज़रूरी सीटों की संख्या भी कम हो जाएगी."
सीपीएन-यूएमएल के नेपाल-खनाल धड़े के एक नेता ने कहा कि अभी उन्होंने अपने क़दम के बारे में कोई फ़ैसला नहीं लिया है.
इस धड़े के नेताओं में से एक रघुजी पंत ने सांसद पद से इस्तीफ़ा देने के बारे में कहा, "हमने अभी कोई फ़ैसला नहीं किया है. इस बारे में पार्टी के शीर्ष नेता और स्थायी कमेटी के नेता ही कोई सही फ़ैसला लेंगे."
हालांकि आचार्य का मानना कि इन सांसदों के इस्तीफ़े की संभावना कम ही है.
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