'खलनायक नहीं है पर्यावरण मंज़ूरी'

इमेज स्रोत, MIB India
पिछले दो साल से अगर भारतीय अर्थव्यवस्था पर किसी भी चर्चा को सुनें तो लगेगा की पर्यावरण स्वीकृति न मिलने या ज़रूरत से ज़्यादा देरी होने के कारण सारी अर्थव्यवस्था की गति धीमी हुई है.
स्वीकृति में देरी की बात पर छह अगस्त 2014 को संसद में प्रकाश जावडेकर ने विकास की परियोजनाओं के लिए जंगल की कटाई के मुद्दे पर जवाब देते हुए कहा था, "…प्रोजेक्ट प्रस्ताव में जानकारी पूरी न होने, अतिरिक्त जानकारी समय से न दिए जाने, वनवासियों के पुनर्वास से जुड़े मुद्दों और योजना के पर्यावरणीय प्रभाव की गहरी और दूरगामी जानकारी के अभाव में पर्यावरण स्वीकृति में देरी होती है."
लेकिन क्या पर्यावरण की वजह से भारत की प्रगति रुकी हुई है? ऊर्जा के क्षेत्र को ही लें तो सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 11वीं पंचवर्षीय योजना के शुरू होने के पहले से लेकर योजना के दौरान दो लाख बीस हज़ार मेगावाट की क्षमता वाले 276 थर्मल पावर प्लांट्स को पर्यावरण मंज़ूरी दी गई.
विकास की धीमी गति
ये मंज़ूरी न सिर्फ़ 11वीं पंचवर्षीय योजना बल्कि 12वीं पंचवर्षीय योजना तक के लक्ष्यों को पाने के लिए काफ़ी है. हालाँकि इनमें से ज़्यादातर प्रोजेक्ट्स पर काम आगे नहीं बढ़ पाया है.

डब्ल्यूपीएसआई इंडिया (वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया) के अविनाश भास्कर कहते हैं , "विकास की धीमी गति का दोष पर्यावरण स्वीकृति न मिलने पर थोपना सही नहीं है. आंकड़े साफ़ बताते हैं की पर्यावरण स्वीकृति तो ज़रूरत से ज़्यादा मिल रही है और पर्यावरण मंत्रालय तो असल में पर्यावरण की सुरक्षा ही नहीं कर पा रहा."
कुछ समय पहले योजना आयोग ने बार-बार बिजली उत्पादन के लक्ष्यों के पूरा न होने की जाँच की थी और पाया कि निर्माण के दौरान पैसे, उपकरण और काबिल इंजीनियरों के कमी के साथ-साथ ईंधन आपूर्ति न होने और भूमि अधिग्रहण के पेचीदा मामलों के कारण कई प्रोजेक्ट्स खटाई में पड़ गए.
उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ राज्य के अमरकंटक इलाक़े में एक निजी कंपनी का 600 मेगावाट क्षमता वाला बिजली घर कोयले की कमी की वजह से बंद है. यानी बिजलीघर के बनने से खेतिहर ज़मीन और जंगल का हिस्सा भी नष्ट हुआ और लोगों को बिजली का फ़ायदा भी नहीं मिला.
पर्यावरण मंज़ूरी का असर
इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो 6400 मेगावाट क्षमता वाले 16 थर्मल पावर प्लांट्स वाली योजना थी जिसकी शुरुआत यूपीए-1 सरकार के दौरान हुई थी. इनमें से कुल चार को मंज़ूरी मिली और सिर्फ दो बन कर तैयार हुए जिनमें बिजली का उत्पादन शुरू हो पाया.

इस देरी की वजह से नौवीं योजना से लेकर 11वीं योजना के बीच हमेशा लक्ष्य और पूर्ति के बीच 50 प्रतिशत की कमी रही है. इसका खामियाज़ा जनता ने बिजली की कटौती और उद्योगों ने डीजल जेनरेटर से महंगी और प्रदूषण फैलाने वाली बिजली ख़रीद कर भुगता है.
साथ ही सरकार भी 2012 तक देश के हर नागरिक को बिजली पहुंचाने के अपने वादे को पूरा नहीं कर पाई.
ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि जिन प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दे दी गई है उन्हें तेज़ी से पूरा किया जाए, देरी करने वाले कारणों पर तुरंत ध्यान दिया जाए और बेवजह पर्यावरण मंज़ूरी को खलनायक न बनाया जाए.
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