क्या इस बार चल पाएगा मायावती का ब्राह्मण कार्ड?

मायावती, बसपा

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बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती का चुनावी गणित साल 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नहीं चला और वह सत्ता से बाहर हो गयीं.

लखनऊ में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की एक सूची जारी करते हुए उन्होंने कहा था कि वह बहुत ज़िद्दी हैं और भले सत्ता में ना रहें लेकिन सर्वसमाज के लिए उनकी लड़ाई जारी रहेगी.

मायावती ने अपने दल की पहली सूची वकील और पार्टी के राज्यसभा सांसद सतीश चन्द्र मिश्रा के घर से जारी की थी. 36 उम्मीदवारों की इस पहली सूची में लगभग आधे ब्राह्मण थे बाद में कुल 80 प्रत्याशियों में इनकी संख्या बढ़कर 21 हो गयी.

साल 2004 में <link type="page"><caption> मायावती</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/04/140331_mayawati_politics_election2014_pk.shtml" platform="highweb"/></link> ने सिर्फ़ सात ब्राह्मणों को टिकट दिया था. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के ब्राह्मण प्रत्याशियों की संख्या बढ़कर 21 हो गयी. इनमें से छह ब्राह्मण लोकसभा के लिए चुने गए.

साल 2009 में अधिक ब्राह्मणों को टिकट देने के पीछे बसपा का साल 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किया गया 'सर्वधर्म समाज' के नारे का सफल परीक्षण था.

इन 21 ब्राह्मण प्रत्याशियों में मायावती ने सीधे-सीधे उनकी जीत की संभावना पर ध्यान दिया और बाबरी मस्जिद तथा भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मसलों को किनारे कर दिया.

दागी उम्मीदवार

इस बार बसपा ने सुल्तानपुर से पवन पाण्डेय को टिकट दिया है. पवन पाण्डेय शिव सेना के विधायक रह चुके हैं और को गिराने में अभियुक्त हैं. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने उनके विरुद्ध आरोपपत्र भी दाखिल किया हुआ है.

पवन पाण्डेय को प्रत्याशी बनाए जाने पर बसपा के प्रदेश प्रवक्ता रामअचल राजभर कहते हैं, "यह पार्टी के संगठन का और बहन मायावती का निर्णय है." राजभर को विश्वास है कि पाण्डेय की वजह से मुसलमान पार्टी से नाराज़ नहीं होंगे.

मायावती, बसपा

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सुल्तानपुर, जो मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है, वहाँ से भाजपा ने वरुण गांधी को मैदान में उतारा है.

जहां एक तरफ मायावती मुसलमानों का भरोसा जीतने की भरपूर कोशिश में हैं वहीं दूसरी तरफ उनका पवन पाण्डेय को टिकट देना समझ के परे है.

जिस तरह मायावती ने पवन पाण्डेय के दोषारोप को नज़रअंदाज़ किया है उसी तरह उनके लिए भ्रष्टाचार भी अधिक महत्त्व नहीं रखता है.

मायावती सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा को फतेहपुर सीकरी से और भाई मुकुल उपाध्याय को ग़ाज़ियाबाद से टिकट दिया गया है. रामवीर उपाध्याय कथित तौर पर मायावती के सबसे भ्रष्ट मंत्रियों में गिने जाते थे और लोकायुक्त ने भी उनको दोषी पाया था.

सर्वजन समाज

सतीश चन्द्र मिश्रा की रिश्तेदार अनुराधा शर्मा को झाँसी से तथा एक अन्य क़रीबी नकुल दुबे को लखनऊ से टिकट दिया गया है. लेकिन देवरिया से पार्टी ने एक ब्राह्मण कमलेश शुक्ल का नाम काट कर नियाज़ हसन को मैदान में उतार दिया है. देवरिया में हसन का मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी के कलराज मिश्रा से होगा.

राज्य सभा में पार्टी के सांसद ब्रजेश पाठक उन्नाव में कांग्रेस की अनु टंडन के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ेंगे.

पार्टी के अन्य ब्राह्मण प्रत्याशी जिनको इस बार चुनाव लड़ना है उनमें प्रमुख हैं कुशल तिवारी (खलीलाबाद), राकेश पाण्डेय (अकबरपुर), प्रदेश के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री राकेशधर त्रिपाठी (भदोही ), काशीनाथ शुक्ल (महाराजगंज) अनिल शुक्ल वारसी (कानपुर देहात), संगम मिश्रा (कुशीनगर), सुनील मिश्रा (कन्नौज) और वीरेंद्र पाण्डेय (बलिया).

मायावती, बसपा

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मायावती का सर्वजन समाज का फॉर्मूला भारतीय जनता पार्टी के जातीय समीकरण और नरेंद्र मोदी के नाम के आगे कितना सफल होगा कहना मुश्किल है. लेकिन इतना ज़रूर है कि बसपा अध्यक्ष का जो दलित वोट बैंक है उसका लाभ पार्टी के ब्राह्मण प्रत्याशियों को अवश्य मिलेगा.

उत्तर प्रदेश में 22 प्रतिशत <link type="page"><caption> दलित</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140323_dalit_series_election_2014_spl_aa.shtml" platform="highweb"/></link> और 11 प्रतिशत ब्राह्मण हैं. इसके अलावा 18.5 प्रतिशत मुस्लिम वोटर में भी यदि मायावती के समर्थक सामरिक वोटिंग के चलते ब्राह्मण प्रत्याशियों को वोट देते हैं तो <itemMeta>hindi/india/2014/03/140325_mayawati_bihar_politics_election_2014_spl_aa</itemMeta> को फ़ायदा हो सकता है.

मायावती बौद्ध हैं और उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करते समय उन्होंने काफ़ी ज़ोर देकर कहा कि वह अंधविश्वासी नहीं हैं.

यह सफाई उन्हें तब देनी पड़ी जब उनसे प्रेस वार्ता के स्थल के चयन के बारे में पूछा गया. मायावती की पहली लिस्ट की घोषणा सतीश चन्द्र मिश्रा के निवास स्थान पर कर रही थीं जहां से 2007 विधान सभा चुनाव से पहले उन्होंने अपने सर्वजन समाज की शुरुआत की थी.

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