इनफ़र्टिलिटी: इलाज का बीमा क्यों नहीं

पंकज कुशवाहा और मंजू कुशवाहा पिछले 22 साल से अपना बच्चा पाने की आस में हैं.
तीन बार आइवीएफ़ (इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन) के ज़रिए संतान पाने की कोशिश में असफल रहने के बाद वो हिम्मत हार चुके थे. एक परिचित ने आर्थिक मदद देने का वादा किया और वो एक बार फिर दिल्ली के एक आइवीएफ़ क्लीनिक में पहुँचे हैं.
कम आमदनी वाले कुशवाहा दंपत्ति ने बीमा कंपनियों के भी चक्कर लगाए मगर उन्होंने आइवीएफ़ के लिए बीमा करने से इनकार कर दिया.
मंजू बताती हैं, "जितना कमाते हैं सब डॉक्टरों को ही जाता है."
क़र्ज़ के नीचे दबे हैं, पर अब भी उम्मीद है कि शायद उनके घर में कोई किलकारी गूँजे.
भारत में लगभग एक करोड़ 20 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी कहानी पंकज और मंजू से मिलती है.
चंडीगढ़ की मोनिका ढूँढाणी ने इस समस्या का बढ़ता दायरा देखते हुए पंजाब- हरियाणा उच्च न्यायलय में फ़रवरी में एक जनहित याचिका दायर की थी.
याचिका में अदालत ने पंजाब और हरियाणा के स्वास्थ्य विभाग और बीमा कंपनियों सहित कई पक्षों को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर अप्रैल 2013 तक फ़ैसला करने का आदेश दिया.

इस आदेश पर किसी भी पक्ष ने कोई कार्रवाई नहीं की. इसके बाद अब अदालत ने 22 जुलाई तक जवाब दाख़िल करने का समय दिया है.
जिन पक्षों को अपना जवाब देना है उनमें वित्त मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, पंजाब और हरियाणा का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, बीमा नियामक प्राधिकरण( इरडा ), और चार बीमा कंपनी शामिल हैं.
क्या कहती हैं बीमा कंपनियाँ?
यूनाइटेड इंडिया इन्श्योरेंस कंपनी के उपमहाप्रबंधक शिव कुमार ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "इनफर्टिलिटी कोई बीमारी नहीं है". उन्होंने यह भी कहा कि बीमारी पता चलने के बाद अगर कोई बीमा लेना चाहेगा तो यह संभव नहीं होगा. यह बीमा के "सिद्धांत के विरुद्ध है".
शिव कुमार कहते हैं कि कंपनी इसके लिए बाध्य नहीं हैं क्योंकि ऐसा कोई कानून तो बना नहीं कि <link type="page"><caption> इनफर्टिलिटी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121101_surrogate_india_ac.shtml" platform="highweb"/></link> को कवर करना ही है. बीमा नियामक प्राधिकरण या इरडा ने ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया है.
बीमा नियामक क्या कहता है
मोनिका ढूँढाणी ने बीबीसी को बताया कि इरडा ने उनके पत्र के जवाब में कहा कि इनफर्टिलिटी के बारे में आंकड़े इकठ्ठा करना बहुत मुश्किल है इसलिए बीमा उत्पाद की लागत के बारे विश्लेषण नहीं हो पाता. यही वजह है की हम इनफर्टिलिटी का बीमा नहीं दे सकते.
बीबीसी ने इस सिलसिले में बीमा नियामक इरडा के अधिकारियों से बात करनी चाही लेकिन उनकी तरफ़ से जवाब आया कि वो अपनी बात अदालत में ही कहेंगे.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 30 नवम्बर 2009 को जारी एक दस्तावेज़ में इनफर्टिलिटी को बीमारी माना है. कनाडा और इस्त्राइल में सरकारी बीमा कंपनियाँ इनफर्टिलिटी के लिए बीमा देती हैं. <link type="page"><caption> ब्रिटेन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130628_uk_supports_three_person_ivf_rns.shtml" platform="highweb"/></link> और न्यूज़ीलैंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अंतर्गत इनफर्टिलिटी का इलाज आंशिक रूप से मुफ्त है.
"बच्चा दे दीजिए"

आईवीएफ़ और रिप्रोडक्टिव मेडिसिन में वरिष्ठ परामर्शदाता डॉक्टर रीता बक्शी बताती हैं, "कई बार ऐसे लोग भी आते हैं जो अपना घर- बार, खेत, गहने सब बेचकर, डॉक्टर की झोली में पैसे रख बोलते हैं कि "बच्चा दे दीजिए."
डॉक्टर रीता ने इस इलाज में प्रयोग होने वाली महंगी दवाईयों पर सब्सिडी की मांग की.
उन्होंने बताया कि पहले जहाँ केवल आठ से नौ प्रतिशत लोगों में बच्चा पैदा करने की क्षमता नहीं थी, आज लगभग 15 प्रतिशत लोग इसके शिकार हैं. इसका कारण उन्होंने धूम्रपान, शराब, जंक फ़ूड, बढ़ती बीमारियाँ और छोटी उम्र में गर्भपात बताया.
<link type="page"><caption> परखनली शिशु</caption><url href="Filename: http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/04/130411_test_tube_baby_dp.shtml " platform="highweb"/></link> यानी आईवीएफ से पैदा हुए बच्चे को पाने की दर पूरे विश्व में 40 से 45 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है. इसलिए कई बार दो या तीन साइकिल की भी ज़रुरत पड़ जाती है.
क्या किया जा सकता है
डॉक्टर रीता बक्शी ने तीन उपाय सुझाए.
पहला, ऐसा बीमा जिसमें सबसे बहुत छोटा अंशदान लिया जाए. दूसरा, बीमा का कवर कैप और कुछ मानक तय हों. तीसरा, सरकार दो या तीन बार की कोशिश तक लोगों को आर्थिक सहायता दे.
आर्थिक सहारा होने के बाद लोग 10 -15 साल इंतज़ार नहीं करेंगे और समय रहते ही डॉक्टर के पास पहुंचेंगे. इससे इलाज आसान हो सकेगा.
बड़े और स्तरीय केंद्र हों

डॉ आभा मजूमदार ने कहा, "इनफर्टिलिटी के इलाज के लिए एकरूपता या नियम- क़ानून ना होने की वजह से वह इसकी दवा को बीमा में लाना मुश्किल हैं लेकिन उपचार में होने वाली सर्जरी को जरूर बीमा देना अच्छा होगा.
वह कहती हैं कि "छोटे-छोटे आईवीएफ सेंटर होने की बजाए बड़े आईवीएफ सेंटर बनाए जाएँ.
वह कहती हैं "बच्चा पाने के इलाज को बीमा मिले, सरकार इनफर्टिलिटी के इलाज के लिए अच्छे केंद्र बनाए."
मरीज़ों को उन्होंने सलाह दी कि "जिस भी अस्पताल में इलाज कराने की सोच रहे हैं, उसकी अच्छे से खोज- ख़बर लें."
खुल रहे हैं अनधिकृत केंद्र भी

इलाज कराने कानपुर से दिल्ली आये राम बाबू और शैलजा शुक्ल भी पिछले आठ साल से अपने बच्चे की उम्मीद में हैं. राम बाबू कहते हैं, "छोटे शहरों में जगह -जगह इसके केंद्र खुल गए हैं ."
वह कहते हैं "जो बीमारी बढ़ती है सरकार उसके इलाज पर सब्सिडी देती है, मुफ्त दवाइयाँ और एड देती है, इस इलाज के साथ भेद -भाव क्यों?"
मंजू कुशवाहा कहती हैं, "बिना बच्चे की कैसी जिंदगी होती है वो हम झेलते हैं. हर कोई चाहेगा कि बच्चा हो."
शैलजा और मंजू खुशनसीब हैं कि कम से कम इतने सालों तक उनकी शादी बची हुई है. अदालतों में बाँझपन के आधार पर दायर किए गए तलाक के मुकदमों की संख्या भी कम नहीं है.
ज़्यादातर मामलों में ससुराल पक्ष इलाज में लगने वाले पैसे देने से बेहतर तलाक़ लेना समझता है.
फिलहाल मोनिका, मंजू, पंकज, राम बाबू , शैलजा और ना जाने कितने लोगों की निगाहें 22 जुलाई को सभी प्रतिवादियों का जवाब का मिलने के बाद अदालत के फैसले पर होगी. अदालत ही यह फैसला करेगी कि इनफर्टिलिटी के इलाज को बीमा ना मिलने से अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन हो रहा है या नहीं.
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