बेमतलब नहीं यूपी में ब्राह्मणों को रिझाने की होड़

लोकसभा चुनाव करीब आता देख, उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- <link type="page"><caption> समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130515_mayawati_ministers_up_government_pk.shtml" platform="highweb"/></link> में ब्राह्मण समुदाय को <link type="page"><caption> रिझाने की होड़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130512_up_brahman_sm.shtml" platform="highweb"/></link> सी लग गयी है.
जहाँ बहुजन समाज पार्टी जिलों में ब्राह्मण भाईचारा सम्मलेन कर रही है , वहीं सतारूढ़ समाजवादी पार्टी ने पंडितों का वोट पाने के लिए प्रबुद्ध वर्ग सम्मलेन और परशुराम जयंती सहारा लिया है.
सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का जनाधार परम्परागत रूप से पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय में रहा है.
सपा ने इसके बाद ऊँची जातियों में ठाकुर बिरादरी को जोड़कर अपना वोट बैंक बढ़ाया.
इसके उलट बहुजन समाज पार्टी ने सन 2007 में अपने परम्परागत दलित वोट बैंक में ब्राहमण समुदाय को जोड़ा.
एसपी की मुहिम
ब्राह्मणों के समर्थन से बहुजन समाज पार्टी सत्ता में तो आ गई लेकिन 2007 से 2012 तक पांच साल के शासनकाल में मायावती ने केवल दलित एजेंडे पर काम किया.
इसलिए ऊँची जातियां बहुजन समाज पार्टी से विमुख हो गईं और बसपा 2012 का विधान सभा चुनाव नही जीत पाई.
बहुजन समाज पार्टी की कमजोरी का सीधा लाभ समाजवादी पार्टी ने उठाया.
पिछले साल सत्ता में वापस आने के बाद समाजवादी पार्टी ने प्रोन्नति में आरक्षण का मायावती का क़ानून खत्म कर दिया.
इसका सीधा लाभ ऊँची जातियों और सबसे ज्यादा ब्राह्मणों को मिला.
प्रोन्नति में आरक्षण की बहाली के लिए मायावती ने केंद्र पर दबाव बनाया.
कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले में संविधान संशोधन पर बहुजन समाज पार्टी का साथ दिया.
समाजवादी पार्टी ने प्रोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान संशोधन का पुरजोर विरोध किया.

इसके चलते ब्राह्मण एवं अन्य ऊँची जातियों के लोग समाजवादी पार्टी के करीब आए.
समझा जाता है कि इसीलिए समाजवादी पार्टी ने पहले प्रबुद्ध वर्ग सम्मलेन और फिर परशुराम जयंती का कार्यक्रम करके पहली बार खुल्लमखुल्ला ब्राह्मण समुदाय को रिझाने की कोशिश की.
दो सारथी
पार्टी अध्यक्ष <link type="page"><caption> मुलायम सिंह यादव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130325_mulayam_bjp_analysis_rj.shtml" platform="highweb"/></link> के अलावा मुख्यमंत्री <link type="page"><caption> अखिलेश यादव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130314_up_akhilesh_yadav_mulayam_sp_adg.shtml" platform="highweb"/></link> ने इन सम्मेलनों को संबोधित किया.
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वादा किया कि बहुजन समाज पार्टी सरकार में ब्राह्मणों पर दलित उत्पीड़न के जो फ़र्जी मुक़दमे कायम किए गए हैं उन्हें वापस ले लिया जाएगा.
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि ब्राह्मणों का रुझान उनकी पार्टी के प्रति बढ़ा है, “समाजवादी पार्टी तो धर्म-निरपेक्ष पार्टी है और जातिवाद में हमारा कोई यकीन नही है. लेकिन इस बीच जो घटनाएं हुई हैं और प्रोन्नति में आरक्षण का मामला आया उससे लोग समझने लगे कि समाजवादी पार्टी में सबके साथ न्याय है. चूँकि हम सामाजिक न्याय के सिद्धांत के लोगों में हैं, तो अब उनका रुझान, जिनको लोग अपर कास्ट या ब्राह्मण समाज कहते हैं, हमारी तरफ ज़्यादा हुआ है.”
विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय के अलावा अखिलेश सरकार के दो मंत्री तेज नारायण पाण्डेय और मनोज पाण्डेय सपा की इस मुहिम की अगुवाई कर रहे हैं.
बीएसपी भी पीछे नहीं

उधर बहुजन समाज पार्टी की ओर से पार्टी के महासचिव सतीश मिश्र तपती दोपहरी में जिले-जिले में ब्राह्मण भाईचारा सम्मलेन संबोधित कर रहे हैं.
सतीश मिश्र का कहना है समाजवादी पार्टी सरकार में जो ब्राहमण मंत्री हैं वे बेचारे हैं और उनके पास कोई ताकत नही है.
लेकिन ख़बरों के मुताबिक़ सतीश मिश्र के सम्मेलनों में इस बार पहले जैसी भीड़ नही जुट रही है.
कहा जा रहा है कि पांच साल सरकार में रहते हुए सतीश मिश्र ने केवल अपने परिवार और रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया और बाक़ी लोगों से वह मिले तक नहीं.
इसलिए लोग अब उनके ब्राहमण भाईचारा सम्मेलनों में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं.
याद दिलाते चलें कि एक जमाने में बहुजन समाज पार्टी के नेता ब्राह्मणों को खुले आम गाली देते थे.
लेकिन भारतीय जनता पार्टी के साथ साझा सरकार चलाने के बाद बसपा नेतृत्व ने महसूस किया कि केवल दलित समुदाय के सहारे सरकार नही बन सकती.
इसलिए अपना जनाधार बढ़ाने के लिए बसपा ने ऊंची जातियों को भी अपने साथ जोड़ना शुरू किया.
विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं कि समतामूलक समाज बनने के लिए पार्टी ने अपनी रणनीति बदली.

वह कहते हैं, “समतामूलक समाज की स्थापना का जो समाज का एक संकल्प है, उसके अनुरूप भारत बनाने के लिए ब्राह्मण समाज की आवशयकता इसलिए है कि वह बुद्धिजीवी है, पढ़ा लिखा है और साथ ही साथ चीज को समझने कि क्षमता उनके अंदर ज्यादा है. वह अगर दिल-दिमाग से साथ खड़ा हो जाता है तो समतामूलक समाज बनाने में हमें काफी आसानी होगी.”
सीटों का गणित
उत्तर प्रदेश में करीब 11 फीसदी मतदाता ब्राह्मण समुदाय के हैं.
राज्य की 80 से करीब 25 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ ब्राह्मण मतदाता चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं.
संभवतः इसीलिए सपा और बसपा दोनों करीब बीस-बीस सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशी उतार रही हैं.
ब्राह्मण समुदाय परम्परागत रूप से पहले कांग्रेस के साथ जुड़ा था.
कांग्रेस के कमजोर होने के बाद वह भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा.
लेकिन जब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों कमजोर हो गयीं, तब ब्राह्मणों ने सत्ता में साझेदारी के लिए बहुजन समाज पार्टी का न्योता स्वीकार कर लिया था.

मगर पांच साल सत्ता में रहते हुए बसपा ने सर्वजन का नारा छोड़कर सरकारी योजनाओं का लाभ दलित केवल समुदाय को दिया, तो उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समुदाय एक बार फिर राजनीतिक सहारा ढूंढने लगा.
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही समाजवादी पार्टी के इस नए-नए ब्राहमण प्रेम को चुनौती दे रही हैं. वे इसे एक छलावा कहते हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने जब से अपनी बागडोर दोबारा राजनाथ सिंह को सौंप दी है, तब से ठाकुर समुदाय का रुझान बीजेपी की ओर बढ़ता दिख रहा है.
ठाकुर समुदाय अगर बीजेपी की तरफ झुकता है, तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा.
समझा जाता है कि इस संभावित नुकसान की भरपाई के लिए मुलायम सिंह यादव ब्राहमण समुदाय को रिझाने में लगे हैं.
मगर टीकाकारों का कहना है कि ब्राहमण समुदाय पूरे प्रदेश में थोक में किसी एक पार्टी के साथ जाने के बजाय एक-एक सीट के आधार पर स्थानीय समीकरण देखते हुए फ़ैसला करता है.
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