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कोरोना वायरस: आख़िर भारत मलेरिया की दवाई बेचने से बच क्यों रहा है?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन या एचसीक्यू. मलेरिया में इस्तेमाल होने वाली ये दवा अब भारत में बहस का केंद्र बन गई है.
मंगलवार शाम अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपनी रोज़ाना प्रेसवार्ता में इस दवा से जुड़े सवाल के जवाब में कहा कि भारत यदि अमरीका को ये दवा नहीं बेचेगा तो इसके 'परिणाम' हो सकते हैं.
इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप इस दवा को कोविड-19 के इलाज में कारगर बता चुके थे. हालांकि उनके इस दावे की अभी मेडिकल विशेषज्ञों ने पुष्टि नहीं की है. यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी ने कहा है कि कोरोनावायरस के इलाज में इस दवा का इस्तेमाल क्लिनिकल ट्रायल के अलावा नहीं किया जाना चाहिए.
ट्रंप ने इससे पहले दिए अपने एक बयान में ये भी कहा था कि उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा है कि वो अमरीका के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के निर्यात पर लगी रोक हटा दें.
लेकिन मंगलवार शाम जब एक पत्रकार ने ट्रंप से पूछा कि क्या आप भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमरीका के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन निर्यात पर रोक लगाने से चिंतित हैं?
ट्रंप ने कहा, "मैंने भारतीय प्रधानमंत्री से बात की है. हम दोनों की बीच अच्छी बातचीत हुई है. अगर वो हमें एंटी मलेरिया दवाई भेजते हैं तो अच्छा रहेगा. अगर वो नहीं देते हैं तो ज़ाहिर है कि अमरीका की तरफ़ से जवाबी कार्रवाई हो सकती है."
वहीं ट्रंप के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि भारत ने इस दवा समेत अन्य दूसरी दवाओं के निर्यात पर लगी रोक आंशिक रूप हटा ली है.
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में ये भी कहा है कि मीडिया के एक वर्ग में कोरोना वायरस से जुड़ी दवाओं को लेकर ग़ैरज़रूरी विवाद पैदा किया जा रहा है.
अपने बयान में विदेश मंत्रलाय ने कहा है कि किसी भी ज़िम्मेदार सरकार की तरह हमारी भी पहली प्राथमिकता अपनी आबादी के लिए दवा की उपलब्धता सुनिश्चित करना है.
विदेश मंत्रलाय का कहना है कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन और अन्य दवाओं के निर्यात पर अस्थायी रोक इन्हीं प्रयासों के तहत लगाई गई थी और सभी परिस्थितियों के विश्लेषण के बाद चौदह दवाओं के निर्यात पर रोक आंशिक रूप से हटाई गई है.
इसी बीच विपक्ष ने भारत सरकार के इस दवा के निर्यात पर रोक हटाने के फ़ैसले पर सवाल उठाए हैं.
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने कहा है, दोस्ती में पलटवार नहीं होता है. भारत को ज़रूरत के समय सभी देशों की मदद करनी चाहिए लेकिन जीवनरक्षक दवाओं को पहले भारतीयों के लिए पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाना चाहिए.
वहीं सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीकी राष्ट्रपति के पलटवार करने के दबाव में आ गए हैं.
अमरीका ने जहां भारत से ये दवा मांगी हैं वहीं अपने देश की कंपनियों पर चिकित्सीय उपकरण या सामान निर्यात करने पर रोक लगा रखी है.
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इजाद किया गया था. ये दवा मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जाती है. इसके अलावा इसे जोड़ों के दर्द के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. अमरीका की जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के लुपस सेंटर के मुताबिक ये दवा मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द को कम करती है.
भारत के इस दवा के निर्यात पर रोक लगाने और फिर ट्रंप के बयान के बाद रोक हटाने के बाद कई सवाल उठे हैं.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत के पास पर्याप्त मात्रा में अपनी आबादी के लिए ये दवा उपलब्ध है?
इंडियन ड्रग्स मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन के एक्ज़ेक्युटिव डायरेक्टर अशोक मदान कहते हैं कि भारत के पास अपनी आबादी के लिए पर्याप्त मात्रा में ये दवा है.
बीबीसी से उन्होंने कहा, 'अगर हम आज की तारीख़ की ज़रूरतों के हिसाब से बात करें तो हमारे पास भारत की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक है.'
मदान बताते हैं, 'भारत में हर महीने क़रीब बीस लाख टेबलेट की ज़रूरत पड़ती है. यानी साल में क़रीब दो करोड़ चालीस लाख टेबलेट. वहीं भारत प्रतिवर्ष बीस करोड़ टेबलेट बना सकता है. यानी हमारी क्षमता ज़रूरत से लगभग नौ गुणा ज़्यादा है.'
मदान कहते हैं, ''अभी ये दवा मलेरिया और रयूमोटाइट आर्थराइटिस में इस्तेमाल की जाती है. हम इसे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवा पा रहे हैं लेकिन कोविड-19 के बाद दवा की ज़रूरत कितनी बढ़ेगी ये भी प्रोजेक्शन के बाद ही पता चलेगा. लेकिन आज के वक़्त में हम ये कह सकते हैं कि हम घरेलू ज़रूरत को सहजता से पूरा करने की स्थिति में हैं.''
मदान कहते हैं, ''हमारे पास इस दवा का कुछ सरप्लस भी है लेकिन निर्यात करने का निर्णय सरकार को ही लेना है.''
उन्होंने बताया कि अभी दवा निर्माताओं को डीजीएफ़टी (विदेश व्यापार महानिदेशालय) की ओर से नोटिफ़िकेशन नहीं मिला है.
मदान कहते हैं कि दवा निर्माता डीजीएफ़टी के नोटिफ़िकेशन के हिसाब से ही काम करेंगे. वो कहते हैं, 'हम डीजीएफ़टी को बताएंगे कि किस-किस देश से ऑर्डर मिले हैं और कितना पैसा मिला है, उसी के बाद निर्यात की अनुमति मिलेगी.''
भारत इस दवा के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है और मुख्य तौर पर अफ्ऱीकी देशों को इस दवा को निर्यात करता है. मदान कहते हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बयान के बाद दूसरे देशों में भी इस दवा की मांग बढ़ेगी. मांग की वजह से इसकी क़ीमतें भी बढ़ रही है.
वो कहते हैं, 'जब मांग बढ़ती है तो दाम भी बढ़ते हैं, ये बाज़ार पर ही निर्भर होता है.'
मदान ये भी कहते हैं कि लॉकडाउन की वजह से उत्पादन क्षमता भी प्रभावित हुई है.
इसी बीच इस दवा को भारत में अब सिर्फ़ डॉक्टर की सलाह पर ही हासिल किया जा सकेगा. इसे कैमिस्ट काउंटर पर नहीं बेच सकेंगे.
हालांकि भारत में दवा की दुकानों पर इसकी उपलब्धता घट रही है. जिन केमिस्टों से हमने बात की उनका कहना था कि उनके पास ये दवा अभी उपलब्ध नहीं है.
मुरादाबाद के एक केमिस्ट ने बताया कि ये दवा अब सीधे अस्पतालों को भेजी जा रही है और केमिस्टों को नहीं मिल रही है.
एक अन्य केमिस्ट ने कहा कि सिर्फ़ मलेरिया की ही दवा नहीं बल्कि दूसरी दवाइयों भी दुकानों तक नहीं पहुंच पा रही हैं, इसकी सबसे बड़ी वजह लॉकडाउन की वजह से सप्लाई चेन का प्रभावित होना है.
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