बाल ठाकरे कहते थे 'कमलाबाई (बीजेपी) वही करेगी जो मैं कहूंगा': विवेचना

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

बात 1995 की है. मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों के काफ़ी दिनों बाद मणि रत्नम ने इस पर एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम रख गया था, 'बॉम्बे.'

इस फ़िल्म में शिव सैनिकों को मुसलमानों को मारते और लूटते हुए दिखाया गया था. फ़िल्म के अंत में बाल ठाकरे से मिलता जुलता एक चरित्र इस हिंसा पर अपना दुख प्रकट करता दिखाई देता है. उसके साथ एक मुस्लिम नेता भी इसी तरह के विचार प्रकट करता है.

ठाकरे ने इस फ़िल्म के प्रदर्शन का विरोध किया और कहा कि वो उसे मुंबई में प्रदर्शित नहीं होने देंगे.

इस फ़िल्म के वितरक अमिताभ बच्चन ठाकरे के दोस्त थे. वो उनके पास गए और पूछा क्या शिव सैनिकों को दंगाइयों के रूप में दिखाना उन्हें बुरा लगा?

ठाकरे ने जवाब दिया, "बिल्कुल भी नहीं. मुझे जो चीज़ बुरी लगी वो था दंगों पर ठाकरे के चरित्र का दुख प्रकट करना. मैं कभी किसी चीज़ पर दुख नहीं प्रकट करता."

शब्दों में परिहास और कटुता

अपने चालीस साल से भी अधिक के राजनीतिक जीवन में कोई ऐसा विषय नहीं हुआ करता था, जिस पर ठाकरे की राय नहीं हुआ करती थी. चाहे राष्ट्रीय राजनीति हो या कला या खेल या कोई और भी विषय, बाल ठाकरे उस पर टिप्पणी करने से परहेज़ नहीं करते थे.

उनके शब्दों में अक्सर दूसरों के लिए परिहास होता था या नाक़ाबिले-बर्दाश्त तीखापन. ठाकरे के पास लोगों की परेशानी से जुड़े क़िस्सों का भंडार था.

मशहूर पत्रकार वीर साँघवी बताते हैं, "वो अक्सर एक कहानी सुनाया करते थे. एक बार रजनी पटेल की पार्टी में महाराष्ट्र के तत्कालीन क़ानून मंत्री शराब के नशे में इतने धुत हो गए कि ठाकरे ने उन्हें अपनी कार में उनके घर छोड़ने की पेशकश की. लेकिन तब तक मंत्री का अपने ऊपर नियंत्रण पूरी तरह से समाप्त हो चुका था."

"ठाकरे की कार में ही उनका पेशाब निकल गया. ठाकरे बहुत मज़े लेकर वो क़िस्सा सुनाते थे कि उनको अपनी कार से पेशाब की बदबू निकालने में महीनों लग गए. कुछ दिनों बाद वही मंत्री ओबरॉय होटल की एक पार्टी में फिर नशे में आ गए. ठाकरे ने उन्हें इस बार लिफ़्ट देने से साफ़ इंकार कर दिया."

विलियम ठेकरे के नाम पर पड़ा ठाकरे नाम

बाल ठाकरे मध्य प्रदेश के मराठी बोलने वाले कायस्थ परिवार से आते थे.

बाल ठाकरे की जीवनी 'हिंदू हृदय सम्राट- हाऊ द शिवसेना चेंज्ड मुंबई फ़ॉर एवर' लिखने वाली सुजाता आनंदन बताती हैं, "ठाकरे के पिता केशव ठाकरे 'वेनिटी फ़ेयर' पुस्तक के अंग्रेज़ी लेखक विलियम मेकपीस ठेकरे के मुरीद हुआ करते थे. उन्होंने उनसे प्रेरणा लेकर अपना पारिवारिक नाम ठैकरे रख लिया जो बाद में बदलकर ठाकरे हो गया."

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 'फ़्री प्रेस जर्नल' में एक कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी, जहाँ मशहूर कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण भी उनके साथ काम किया करते थे.

कांग्रेस की वजह से पनपे बाल ठाकरे

दिलचस्प बात ये है कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने दो दशकों तक बाल ठाकरे का पीछे से समर्थन किया. शुरुआती दिनों में कांग्रेस ने कम्युनिस्ट आंदोलन को तोड़ने में उनकी मदद ली, बाद में उनका इस्तेमाल कांग्रेस की अंदुरूनी लड़ाइयों में हिसाब चुकता करने के लिए किया जाने लगा.

सुजाता आनंदन बताती हैं, "उन दिनों मज़ाक में शिवसेना को महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नायक और वसंतदादा पाटिल के नाम पर वसंत सेना कहा जाता था."

"ये एक संयोग नहीं था कि 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में शिव सेना ने वर्षों से अपने सहयोगी रही भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार की जगह कांग्रेस की प्रतिभा पाटिल का समर्थन करने का फ़ैसला लिया था. वर्ष 2012 में भी कांग्रेस के बिना कहे वो कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के समर्थन में उतर आए थे."

आपातकाल का समर्थन

आपातकाल में भी उन्होंने सारे विपक्ष को दरकिनार कर इंदिरा गाँधी का समर्थन किया. 1978 में जब जनता सरकार ने इंदिरा गाँधी को गिरफ़्तार किया तो उन्होंने उसके विरोध में बंद का आयोजन किया.

सुजाता आनंदन का कहना है कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने इसके लिए ठाकरे को बाध्य किया था.

आनंदन बताती हैं, "चव्हाण ने ठाकरे के पास अपने दूत भेजकर कहा कि उनके पास दो विकल्प हैं. या तो वो दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह गिरफ़्तारी के लिए तैयार हो जाएं या अपना बेहतरीन सूट पहनकर दूरदर्शन के मुंबई स्टूडियों में पहुंचकर इमरजेंसी के समर्थन का ऐलान कर दें."

"ये फ़ैसला लेने के लिए उन्हें आधे घंटे का समय दिया गया था. ठाकरे को पता था कि सरकार इस मामले में गंभीर है क्योंकि चव्हाण ने अपने दूत के साथ पुलिसवालों का एक जत्था भी भेजा था. अपने साथियों से विचार-विमर्श के बाद ठाकरे सिर्फ़ 15 मिनट में दूरदर्शन स्टूडियो जाने के लिए बाहर आ गए थे."

बाल ठाकरे मुंबई में दक्षिण भारतीय लोगों की उपस्थिति के सख़्त ख़िलाफ़ थे. उन्होंने उनके ख़िलाफ़ 'पुंगी बजाओ और लुंगी हटाओ' अभियान चलाया था.

सुजाता आनंदन बताती हैं, "वो तेज़ी से बोली जाने वाली तमिल भाषा का उपहास करते हुए उन्हें 'यंडुगुंडू' कह कर पुकारते थे. वो अपनी पत्रिका मार्मिक के हर अंक में उन दक्षिण भारतीय लोगों के नाम छापा करते थे जो मुंबई में नौकरी कर रहे थे और जिनकी वजह से स्थानीय लोगों को नौकरी नहीं मिल पा रही थी.

बाल ठाकरे से वो यादगार मुलाकात

मुझे सन 2004 में बाल ठाकरे से मिलने का मौका मिला था जब मैं उनका इंटरव्यू लेने उनके निवास स्थान 'मातोश्री' गया था. वो एक छोटे से कमरे में सिंहासननुमा एक कुर्सी पर बैठे हुए थे. जो बात मुझे थोड़ी सी अजीब लगी कि वो अकेले नहीं थे.

आमतौर से जब हम किसी का साक्षात्कार करते हैं तो हम उससे अकेले में बात करते हैं. उनके अगल-बगल उनके 15-20 हाली-मवाली बैठे हुए थे. मैंने दबी ज़ुबान से कहा भी कि क्या हम इन लोगों के सामने आपसे बात करेंगे? तब बाला साहब ने कहा कि उन्हें कोई चीज़ अकेले में करना पसंद नहीं है. वो सबके सामने बात करना पसंद करते हैं.

नाटा क़द था उनका. वो भगवा कपड़े पहने हुए थे. उनके गले और कलाई में रुद्राक्ष की माला पड़ी हुई थी और कमरे के अंदर भी उन्होंने अपने काले चश्मे को नहीं उतारा था. जिस बात ने सबसे अधिक मेरा ध्यान खींचा वो थी उनकी बेबाकी और आँखों में आँखे डालकर बोलने की उनकी अदा.

बीच इंटरव्यू में मैंने उनसे सवाल पूछा था कि आपकी नज़र में बाबरी मस्जिद विवाद का कोई हल निकल सकता है?

बाला साहेब ने जो जवाब दिया वो बिल्कुल हतप्रभ कर देने वाला था, पार्टी लाइन से बिल्कुल अलग. उन्होंने कहा कि 'भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मंगल पांडे की याद में वहाँ स्मारक बनवाया जाना चाहिए.'

उनका ये कहना था कि पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि वो क्या कह रहे हैं. मुझे ख़ुद विश्वास नहीं हुआ कि मैं क्या सुन रहा हूँ. मैंने दोबारा उनसे वही सवाल पूछा और उन्होंने वही बात दोहराई. उस बयान की बहुत चर्चा हुई. पीटीआई ने उसे 'पिक' किया और अगले दिन वो भारत के क़रीब सभी समाचार पत्रों की मुख्य हेडलाइन थी.

जावेद मियांदाद को खाने की दावत

एक तरफ़ ठाकरे भारत के पाकिस्तान से क्रिकेट खेलने के सख़्त ख़िलाफ़ थे, वहीं दूसरी ओर उन्हें पाकिस्तान के बल्लेबाज़ जावेद मियाँदाद को अपने यहाँ भोज पर बुलाने में कोई गुरेज़ नहीं था.

सुजाता आनंदन बताती हैं, "जावेद मियाँदाद ही क्यों अगर इमरान ख़ाँ भी राज़ी होते तो वो उन्हें भी अपने यहाँ खाने पर बुला सकते थे. ठाकरे की कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं थी. 1971 के नगरपालिका चुनाव में उन्होंने मुसलमानों के वंदे-मातरम न गाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में उन्हें पूरा बहुमत नहीं मिला."

"स्थाई समिति के अध्यक्ष के चुनाव के लिए उन्हें दो तीन वोटों की ज़रूरत थी. उन्होंने इसके लिए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बनातवाला का समर्थन लिया. दस दिन पहले तक वो मुसलमानों और मुस्लिम लीग को गाली दे रहे थे लेकिन जब उन्हें उनके समर्थन की दरकार हुई तो उन्होंने अपने क़दम पीछे नहीं खींचे. पाकिस्तान के साथ भी उनका यही रुख़ था. पाकिस्तान की सरकार से उनका विरोध था लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें पाकिस्तानियों से मिलने से कोई परहेज़ नहीं था."

ठाकरे के शरद पवार से संबंध

बाल ठाकरे के चरित्र के विरोधाभासों को उनके एनसीपी नेता शरद पवार के संबंधों से परखा जा सकता है. दिन में वो पवार को 'आटे की बोरी' कहकर उनका मज़ाक उड़ाते थे और शाम को उन्हें, उनकी पत्नी प्रतिभा और बेटी सुप्रिया को अपने घर रात्रि भोज पर आमंत्रित करते थे.

पवार कहते हैं कि वो निजी तौर पर उनके सबसे अच्छे दोस्त थे, लेकिन राजनीतिक तौर पर उनके सबसे बड़े दुश्मन थे.

शरद पवार अपनी आत्मकथा, 'ऑन माई टर्म्स' में लिखते हैं, "बाला साहेब का उसूल था कि अगर आप एक बार उनके दोस्त बन गए तो वो उसे ताउम्र निभाते थे. सितंबर, 2006 में जब मेरी बेटी सुप्रिया ने राज्यसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की तो बाला साहेब ने मुझे फ़ोन किया. वो बोले, 'शरद बाबू मैं सुन रहा हूँ, हमारी सुप्रिया चुनाव लड़ने जा रही है और तुमने मुझे इसके बारे में बताया ही नहीं. मुझे यह ख़बर दूसरों से क्यों मिल रही है?'

"मैंने कहा, 'शिव सेना-बीजेपी गठबंधन ने पहले ही उसके ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी है. मैंने सोचा मैं आपको क्यों परेशान करूँ.' ठाकरे बोले, 'मैंने उसे तब से देखा है जब वो मेरे घुटनों के बराबर हुआ करती थी. मेरा कोई भी उम्मीदवार सुप्रिया के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ेगा. तुम्हारी बेटी मेरी बेटी है.' मैंने उनसे पूछा, 'आप बीजेपी का क्या करेंगे, जिनके साथ आपका गठबंधन है?' उन्होंने बिना पल गंवाए जवाब दिया, 'कमलाबाई की चिंता मत करो. वो वही करेगी जो मैं कहूंगा."

कमलाबाई उनका बीजेपी के लिए कोड-वर्ड था.

बाल ठाकरे और दिलीप कुमार

फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार से उनकी बहुत पुरानी दोस्ती थी. दोनों का अक्सर एक दूसरे के यहाँ आना-जाना लगा रहता था. लेकिन जब दिलीप कुमार ने पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'निशान-ए-इमतियाज़' स्वीकार कर लिया तो उन्होंने उसके विरोध में शिव सैनिकों को उनके यहाँ 'अंडरवियर' में प्रदर्शन करने भेजा.

दिलीप कुमार अपनी आत्मकथा, 'द सब्सटेंस एंड द शैडो' में बाल ठाकरे के कोमल पक्ष पर रोशनी डालते हुए कहते हैं, "बाल ठाकरे और मीना ताई बहुत ज़बरदस्त मेज़बान थे. मेरे लिए उनकी सरलता का हिस्सा बनना हमेशा एक आनंददायक चीज़ हुआ करती थी. अपने अलग अंदाज़ में मीना ताई उन्हें ज़मीन से जोड़े रखती थीं. एक वही थीं जो हम जैसे पुराने दोस्तों से हमेशा संपर्क में रहती थीं. वो हमें अक्सर अपने घर पर खाने पर बुलाती थीं."

"एक बार मुझे और सायरा को एक दोस्त के यहाँ खाने पर बुलाया गया, जहाँ ठाकरे दंपति भी मौजूद थे. उन दिनों सायरा की पीठ में ज़बरदस्त दर्द था. मीनाताई की आँखों से ये बात छुपी नहीं रह सकी. उन्होंने बाला साहेब को भी ये बात बता दी. बाला साहेब ने सारी पार्टी रोक दी. वो रसोई में चले गए. उन्होंने एक ख़ाली बोतल मंगवाई. उसमें एक बर्तन में पानी गर्म कर भरवाया और सायरा से कहा कि वो उसे अपनी दुखती हुई पीठ पर लगाकर बैठ जाएं. उनकी पत्नी और बहू ने सायरा से कहा कि जब वो घर पर बीमार पड़ती हैं, तो वो इसी तरह की चिंता उनके लिए भी दिखाते हैं."

शैंपेन की मांग

बाल ठाकरे सिगार और बीयर पीने के शौकीन थे. सार्वजनिक तौर पर शराब पीने से उन्हें कोई परहेज़ नहीं था. 1995 में जब उनकी पार्टी की जीत पर एक पार्टी दी गई तो उन्होंने इस बात पर ऐतराज़ किया कि वहाँ जीत की ख़ुशी में 'शैंपेन' का प्रबंध क्यों नहीं है?

सुजाता आनंदन बताती हैं, "ये पार्टी मुंबई के बहुत बड़े बिल्डर निरंजन हीरानंदानी के पिता डॉक्टर एल एच हीरानंदानी ने दी थी. जब ठाकरे वहाँ पहुंचे तो 'वेटर्स' फलों का जूस और 'सॉफ़्ट ड्रिंक' सर्व कर रहे थे. ठाकरे ने अपने भाषण में कहा कि डॉक्टर हीरानंदानी बहुत बड़े ईएनटी डाक्टर हैं. 'ई' का अर्थ होता है, 'इयर' यानि कान. मेरे कानों में संगीत की स्वरलहरी सुनाई दे रही है. 'एन' का अर्थ होता है 'नोज़' यानि नाक. मेरी नाक में पकवानों की बहुत अच्छी संगंध पहुंच रही है. 'टी' का अर्थ होता है 'थ्रोट' यानि गला. गले को तर करने के लिए भी तो कुछ दीजिए."

"डॉक्टर हीरानंदानी उनका आशय समझ गए. वो बोले, यहाँ पर मुख्यमंत्री भी मौजूद हैं. उनकी उपस्थिति में शराब कैसे परोसी जा सकती है. ये सुनते ही ठाकरे ने अपना सिर उठाया और कमरे के दूसरे कोने में खड़े हुए मुख्यमंत्री मनोहर जोशी से चिल्लाकर कहा, 'काए रे माना? तू पीतोस नाही का?'( ये क्या है मनोहर? तुम पीते नहीं हो क्या?) मनोहर जोशी का चेहरा देखने लायक था. ठाकरे डॉक्टर हीरानंदानी की तरफ़ मुड़े और बोले, 'हमने अभी-अभी सरकार बनाई है. कम से कम 'शैंपेन' का तो इंतेज़ाम होना चाहिए.' कुछ ही मिनटों में फलों के जूस की पार्टी शराब की पार्टी में बदल गई."

मुंबई और पुणे था उनका गढ़

मराठी मानूस के सबसे बड़े पैरोकार, हिंदू हितों के रक्षक और हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे ने न सिर्फ़ अपने बूते मुंबई को बदलकर रख दिया, बल्कि उसका नाम, चरित्र और तानाबाना भी बदल दिया.

वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर कहते हैं, "उद्धव ठाकरे हों या राज हों, या छगन भुजबल हों या फिर मनोहर जोशी, किसी भी नेता की लोकप्रियता बाल ठाकरे के आसपास भी नहीं थी. इसका मतलब ये कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि बाल ठाकरे की अपील पूरे महाराष्ट्र में थी."

"पश्चिम महाराष्ट्र में उनका बहुत कम समर्थन था. मराठवाड़ा और विदर्भ में भी उनका समर्थन नगण्य था. उनका गढ़ था मुंबई और दूसरे गढ़ बन रहे थे पुणे और नासिक. ये सब शहरी इलाके थे. ग्रामीण इलाकों में और किसानों के बीच बाल ठाकरे की लाख कोशिशों के बावजूद शिव सेना अपनी पैंठ कभी नहीं बना पाई थी."

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