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3 बैंकों के विलय से एक बड़ा बैंक बनाने का आपकी जेब के लिए क्या मतलब
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या आपके ज़हन में ये बात दौड़ रही है कि उस बैंक का क्या भविष्य है जिसके पास आपकी उम्र भर की कमाई है?
करोड़ों भारतीयों की तरह क्या आप ने भी हमेशा से ज़्यादा भरोसा सरकारी बैंकों पर किया है?
अगर आपकी बैंकिंग बैंक ऑफ़ बड़ौदा, विजया बैंक या देना बैंक से होती है तो ये ख़बर आपके लिए है.
अगर किसी और सरकारी बैंक से होती है तो भी ये ख़बर आपके लिए है क्योंकि कल को सरकार आपका बैंक बदलने का फ़ैसला भी ले सकती है.
दरअसल, सोमवार को एनडीए सरकार ने बैंक ऑफ़ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक के विलय की घोषणा की है.
साथ ही बताया गया है कि विलय से बनने वाला बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा.
सरकार के इस क़दम से फ़ायदा क्या
लेकिन बैंक ऑफ़ बड़ौदा और विजया बैंक जैसे मज़बूत बैंकों की तुलना में कमज़ोर और चरमरा से रहे देना बैंक के उनमें विलय करने की वजह क्या हो सकती है.
यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया से हाल ही में रिटायर हुए चेयरमैन अरुण तिवारी ने बताया, "ऐसा करने के बारे में चर्चा और प्लानिंग चार साल पहले शुरू हो गई थी, लेकिन तब सिर्फ़ कागज़ पर ही थी."
"तीन साल पहले पुणे में ज्ञानसंगम नाम से एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें सरकार ने ये तय किया कि किसी भी बैंक के विलय का आधार उस की गुणवत्ता ही होगा जिसमें कर्मचारियों की संख्या से लेकर उसकी आर्थिक हालत वगैरह का पूरा विश्लेषण किया जाएगा".
अरुण तिवारी के मुताबिक इस विलय के कुछ बड़े फ़ायदे हैं, "पश्चिम और उत्तर भारत के अलावा बैंक ऑफ़ बड़ौदा की अंतरराष्ट्रीय शाखाओं के फैलाव का फ़ायदा दूसरों को होगा. दक्षिण भारत में विजया बैंक की मज़बूत पकड़ है. इस सब का फ़ायदा फ़िलहाल खस्ता हालत में चल रहे देना बैंक को होगा."
सरकार की मानें तो इस विलय से ग्राहकों की संख्या, बाज़ार तक पहुँच और संचालन के तरीकों में बेहतरी आएगी और कर्मचरियों के हितों का भी ध्यान रखा जाएगा.
लेकिन इस बात पर फ़िलहाल सिर्फ़ कयास ही लग रहे हैं कि इस नए बैंक का नाम क्या होगा, इसकी ब्रैंड इक्विटी फिर से बनानी पड़ेगी वगैरह-वगैरह.
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शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया
अगर इस फ़ैसले के मौजूदा असर पर बात करें तो बैंक ऑफ़ बड़ौदा के शेयर 17% गिरे हैं जबकि विजया और देना बैंक के शेयरों ने उछाल मारी है.
जानकारों का कहना है कि शेयर बाज़ार में ये होना तय था क्योंकि बैंक ऑफ़ बड़ौदा इनमें सबसे मज़बूत है और उसे कुछ हद तक अब दूसरे बैंकों का भी 'भार झेलना पड़ेगा'.
फ़ैसला मामूली भी नहीं है. तीनों को मिलकर बनने वाले नए बैंक में कुल कर्मचारियों की संख्या 85,000 से ज़्यादा होगी और इस नए बैंक के पास देश-विदेश में कुल 9,485 शाखाएं हो जाएंगी.
इस नए बैंक का बिज़नेस करीब 200 अरब डॉलर यानी 14 लाख 80 हज़ार 400 करोड़ रुपए से ज़्यादा का होगा.
बैंक ऑफ़ बड़ौदा के पूर्व महाप्रबंधक एन रमणी के मुताबिक़ ये प्रक्रिया, "देर आए, दुरुस्त आए वाली है".
उन्होंने कहा, "देश में इसने सारे बैंकों के मौजूद रहने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सरकार को इन सभी को कैपिटल देना पड़ता है. इस विलय को समझने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि दो बड़े और मज़बूत या दो कमज़ोर बैंकों का विलय करने से कोई फ़ायदा नहीं होता."
भविष्य की राह
एन रमणी के मुताबिक़, "विजया बैंक और देना बैंक में सरकार का ख़ासा कैपिटल जाता है जो विलय के बाद कम हो जाएगा. ये भी सच है कि देना बैंक के फंसे हुए ऋण या क़र्ज़ (एनपीए) का प्रतिशत बैंक ऑफ़ बड़ौदा और विजया बैंक के कुल एनपीए से भी ज़्यादा है जो बड़ी चिंता की बात है. लेकिन सरकार बैंक को ख़त्म होने के लिए छोड़ भी नहीं सकती. मुझे लगता है इस क़दम के बाद कई दूसरे बैंकों के विलय का रास्ता भी साफ़ हो गया है."
हालांकि इस बात की घोषणा नहीं की गई है कि नए बैंक का नाम क्या होगा, लेकिन इसी सरकार के पिछले फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए कई जानकारों को लगता है कि बैंक ऑफ़ बड़ौदा की ब्रैंड वैल्यू बड़ी है और नाम वही रहेगा.
रहा सवाल ग्राहकों के मौजूदा कौतूहल का तो विश्लेषकों के मुताबिक़, "आखिरकार सरकार ने कुछ दिन पहले स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सहयोगी बैंकों का विलय एसबीआई में किया था और सब कुछ ठीक ही चल रहा है."
यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व चेयरमैन अरुण तिवारी को लगता है "बैंक कस्टमर को परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है."
उन्होंने कहा, "पिछले 40-50 साल में कम से कम पांच बैंकों का विलय बैंक ऑफ़ बड़ौदा में हो चुका है. चाहे जमाकर्ता हों या ऋण लेने वाले, किसी में न तो कमी आई है और न शिकायत मिली है."
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