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झारखंड: क्यों चर्चा में है विकलांगों का ये समूह
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
रामेश्वर महतो की दोनों आंखें नहीं हैं. उन्हें कुछ भी नहीं दिखता. दस साल के थे, तब खेलने के दौरान आंखों में चोट लगी.
पंद्रह साल के हुए, तो दिखना पूरी तरह बंद हो गया. अब उनकी उम्र 40 साल है. पत्नी और दो बेटियों के अलावा 70 साल के मां-बाप घर पर हैं. इन सबकी ज़िम्मेदारी उनके कंधे पर है.
आंखें नही होने के कारण उन्हें दिक़्क़त होती थी, लेकिन अब यही विकलांगता उनकी सफलता का रास्ता तैयार कर रही है.
वे ख़ूब काम कर रहे हैं और इससे उनकी कमाई भी बढ़ी है. वे बारीडीह में रहते हैं. यह रांची जिले के ओरमांझी प्रखंड का एक गांव है.
क़रीब 3600 लोगों की आबादी वाले इस गांव के लोगों का मुख्य पेशा खेती-मज़दूरी है.
रामेश्वर महतो भी यही काम करते थे लेकिन उनकी प्रोफ़ाइल में अब एक नया काम जुड़ गया है. अब वे राशन दुकान भी चलाते हैं.
विकलांगों का समूह
रामेश्वर महतो बिरसा विकलांग स्वयं सहायता समूह के अध्यक्ष हैं. इस समूह को हाल ही में जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत राशन दुकान चलाने का लाइसेंस मिला है.
बारीडीह गांव के 10 विकलांगों का यह समूह अब अपने गांव के डेढ़ सौ से भी अधिक परिवारों को सरकारी राशन उपलब्ध कराता है.
बीबीसी से बातचीत में रामेश्वर महतो कहते हैं, "आंखें नहीं होने के कारण लोगों की ज़लालत झेलनी पड़ती थी. गांव के दूसरे विकलांग भी इसी भेदभाव के शिकार थे."
"तब हमलोगों ने अपनी तरह के और लोगों को साथ जोड़ा. गांव के दस लोग एकमत हुए और साल-2010 में हमने अपना समूह बना लिया."
"छह साल बाद हमारे समूह को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से मान्यता मिल गई और अब हमें राशन दुकान का लाइसेंस मिल गया है."
"अब लोग हमारा उदाहरण देते हैं."
किसी की आंखें नहीं, कोई पैर से लाचार
रामेश्वर महतो, घुमेश्वर मुंडा और सुंदरलाल महतो की आंखें नहीं हैं. नारायण कुमार महतो पैर से लाचार हैं.
तेजनाथ महतो देख और चल तो सकते हैं लेकिन वे बोलने व सुनने में असमर्थ हैं.
तालकेश्वर मुंडा, फागु करमाली, पूरण महतो, नागेश्वर महतो और बलवंत कुमार भी शरीर के किसी न किसी अंग से लाचार हैं.
इसके बावजूद इनका समूह राशन दुकान संचालित कर रहा है. नारायण कुमार महतो बिरसा विकलांग सहायता समूह के सचिव हैं.
पोलियो के कारण बचपन में ही वे पैरों से लाचार हो गए.
पैदल चलने के लिए भले ही उन्हें सहारे की ज़रूरत हो, लेकिन स्कूटी से बनी ट्राईसाइकिल के सहारे वे राशन गोदाम तक चले जाते हैं.
वहां से गाड़ी पर पर राशन लोड करवा कर उसे गांव तक लाना उनकी जिम्मेवारी है.
कैसे करते हैं काम
नारायण महतो ने बीबीसी को बताया, "जिसकी आंखें नहीं हैं, वह आंख वाले की मदद से वज़न उठा लेता है."
"जिसके हाथ नहीं हैं, वह आंखों का इस्तेमाल कर राशन का वज़न कराता है. पैर से लाचार व्यक्ति हिसाब-किताब कर लेता है."
"तो कोई और ग्राहकों के अंगूठे का मिलान और उनसे पैसे लेने का काम करता है. इस तरह हमलोग एक-दूसरे की अपंगता को ख़ारिज कर अपना काम कर लेते हैं."
ग्राहक भी ख़ुश
सीता देवी का राशन कार्ड इनकी दुकान से संबद्ध है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैं हर महीने यहां से राशन ले जाती हूं. ये लोग जिस तरीक़े से अपना काम निपटाते हैं, वैसा तो शारीरिक तौर पर सक्षम लोग भी शायद नही कर पाएं."
"मुझे ख़ुशी है कि इनलोगों ने विकलांगता से हार नहीं मानी. अब जब एक-दूसरे की सहायता से ये हमे राशन देते हैं, तो हमारी आंखें श्रद्धा से झुक जाती हैं."
कैसे मिला लाइसेंस
स्वयं सहायता समूहों की निगरानी करने वाली संस्था जेएसएलपीएस के प्रोग्राम मैनेजर कुमार विकास ने बताया कि सरकार ने बारीडीह गांव में राशन दुकान के आवंटन की विज्ञप्ति निकाली थी.
"इस समूह ने इसके लिए आवेदन किया. क्योंकि ये विकलांग थे, लिहाजा राज्य निःशक्तता आयुक्त सतीश चंद्रा ने स्वयं इसमें दिलचस्पी ली और इन्हें लाइसेंस मिल गया."
"राशन दुकान संचालन के साथ ही साप्ताहिक बचत कर ये लोग एक-दूसरे की आर्थिक सहायता भी करते हैं."
"क्योंकि, इनका रजिस्टर अपडेट है इसलिए इन्हें लोन मिलने में भी आसानी होती है. ऐसे में यह समूह हमारे लिए मॉडल बन चुका है."
और कितने विकलांग
इस समूह ने ओरमांझी प्रखंड के कुल 1033 विकलांगों का डेटाबेस तैयार किया है.
इनकी निश्चित अंतराल पर मुलाक़ात होती है और विकलांगों को मिलने वाले मासिक छह सौ रुपये के पेंशन और दूसरी सरकारी योजनाओं को प्राप्त करने में ये एक-दूसरे की सहायता करते हैं.
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