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'अयूब पंडित को हिंदू समझकर नहीं मारा गया'
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
श्रीनगर के दिवंगत पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित की स्थानीय भीड़ के हाथों हत्या को एक महीना होने जा रहा है. पिछले हफ़्ते मैं उनके घर उनके परिवार वाले से मिलने गया था.
घर में मातम का अब भी माहौल था लेकिन घर वालों से अनौपचारिक रूप से बातें करके लगा परिवार की सोच में एक संतुलन है.
मोहम्मद अयूब पंडित के परिवार वालों को मालूम है कि पंडित की हत्या को लेकर सोशल मीडिया पर काफी हंगामा हुआ था.
सांप्रदायिक रूप ना दें
परिवार वालों ने कहा कि इसे सांप्रदायिक रूप ना दिया जाए. उनके अनुसार हत्या करने वाले जानते थे कि अयूब मुसलमान थे, उन्हें हिन्दू समझ कर नहीं मारा गया.
वो कहते हैं कि मारने वालों को हिन्दू-मुस्लिम की तरह देखने के बजाए केवल अपराधी की तरह देखना चाहिए
श्रीनगर की जामा मस्ज़िद के बाहर सुरक्षा में तैनात पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित की 22 जून की रात को भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.
वो रात रमज़ान महीने की पवित्र माने जाने वाली शब-ए-क़द्र की रात थी. अयूब नमाज़ पढ़ कर बाहर निकल रहे थे. कहा जाता है कि वो मस्जिद के अहाते में अपने फ़ोन से तस्वीरें ले रहे थी, तभी उत्तेजित भीड़ ने उनपर हमला कर दिया.
राज्य के पुलिस प्रमुख एसपी वैद ने पिछले हफ्ते मुझसे कहा कि अयूब की हत्या की गुत्थी सुलझा ली गयी है और इस सिलसिले में कुछ दिनों में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी पूरी जानकारी दी जायेगी. लेकिन अब तक ये प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है. उन्होंने उसी मुलाक़ात में ये ज़रूर जानकारी दी कि अयूब की हत्या करने वालों में से 16-17 लोगों की शिनाख्त कर ली गयी है और इनमें से अधिकतर को गिरफ़्तार कर लिया गया है.
जहाँ पुलिस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का माहौल बना रही है वहीं अयूब के घर वाले इस इन्तज़ार में हैं कि पुलिस की जांच में क्या सच बाहर निकल कर आता है.
ज्यादा दूर नहीं रहते कातिल
श्रीनगर में अयूब एक बड़े से घर में संयुक्त परिवार में रहते थे. उनकी विधवा, दो बच्चे और दो बड़े भाई के परिवार के सदस्य उसी बड़े घर में रहते हैं. उनके दो बड़े भाई, फ़ारूक़ अहमद पंडित और गुलज़ार अहमद पंडित, शोक के बावजूद हमें अपने घर के अंदर बैठाते हैं, लेकिन कैमरे पर बात करने से साफ़ इनकार कर देते हैं.
भाइयों ने इसकी वजह बताते हुए कहा, "भाई के क़ातिल यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं रहते और सभी स्थानीय हैं. हम कुछ कहें तो हमें भी टारगेट बनाया जा सकता है."
घर के अंदर रिश्तेदारों का आना-जाना अब भी लगा हुआ था. अंदर एक बड़े से कमरे में केवल महिलाएं और बच्चे बैठे थे. वहां एक मौलवी साहब हाथ उठाकर तेज़ आवाज़ में दुआ मांग रहे थे. उनके इस अमल को वहां बैठी महिलाएं बस दुहराए जा रही थीं.
भाइयों ने कहा अयूब की विधवा बात करने की स्थिति में नहीं थीं. दुआ में वो भी शामिल थीं.
उनकी बड़ी और सुन्दर कश्मीरी-स्टाइल की इमारत से अंदाज़ा होता है कि अयूब अच्छे खानदान के थे. उनके दोनों बड़े भाई खुशहाल व्यापारी हैं और उनका बेटा भी व्यापार में लग गया है.
जानने वाली थी भीड़
उनके बड़े भाई फ़ारूक़ अहमद पंडित कहते हैं कि उनके भाई की हत्या के समय भीड़ में शामिल कुछ ऐसे भी लोग थे जिनकी उन्होंने 2015 में आई बाढ़ में मदद भी की थी.
फ़ारूक़ इस बात पर हैरान थे कि भीड़ में शामिल स्थानीय मुसलमानों ने उनके रोज़ेदार भाई को पीट-पीट कर मार दिया. "वो रात में नमाज़ पढ़ कर बाहर निकला ही था कि उस पर हमला कर दिया गया."
भाई की मौत का पता पुलिस के बजाए मीडिया से मिली.
परिवार के लोगों का कहना था कि वो इस मामले को तूल नहीं देना चाहते और जांच में दखल भी नहीं देना चाहते.
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