भाई की मौत का मंज़र मुझे सपने में भी डराता है: उत्तम वर्मा

उन्मादी भीड़ के दिल-ओ-दिमाग़ पर जुनून सवार रहता है. एक ऐसा जुनून जो उसे हैवानियत के दरवाज़े तक ले जाता है.

अफ़वाह इस आग को और भड़का देती है जिसकी वजह से लोगों का समूह सही और ग़लत में फर्क़ नहीं समझता है.

झारखंड के जमशेदपुर शहर में एक ऐसी ही उन्मादी भीड़ का शिकार हुए थे तीन भाई और उनके परिवार के लोग.

इन्हें बच्चा चोर होने के संदेह में उन्मादी भीड़ ने इतना मारा-पीटा कि उनमें से दो भाइयों - विकास और गौतम और उनके एक दोस्त ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

तीसरे भाई उत्तम ने किसी तरह अपनी जान बचाई. कैसे अपने दोनों भाइयों और उनके एक दोस्त को अपने सामने दम तोड़ते हुए उन्होंने देखा.

सुनते हैं उत्तम वर्मा की ज़ुबानी.

उत्तम वर्मा

जुगसलाई, जमशेदपुर (झारखंड)

मौत कैसे अपना व्यूह रचती है. यह हमसे पूछिए. 18 मई की शाम हमलोग साथ बैठे थे. हमने हाल ही में 'सैप्टिक टैंक' बनाने का 'बिज़नेस' शुरू किया था. सो, उसका बैनर लगाने के लिए जगह देख रहे थे.

उस शाम मेरी मां ने 'ज़ीरा राइस' बनाया था. मैंने अपने सबसे छोटे भाई विकास के साथ खाना खाया. फिर उसकी ज़िद पर नागाडीह के लिए निकल पड़े.

हालांकि, मेरी वहां जाने की इच्छा नहीं थी. कोई ताक़त मुझे वहां जाने से रोक रही थी. मन नहीं मान रहा था. हम दोनों भाई अपनी बाइक से नागडीह पहुंचे.

अभी नागाडीह की गली में मुड़े ही थे कि क़रीब 100 लोगों ने घेर लिया. उनके हाथ में तलवार, भाला, लाठी, कुल्हाड़ी आदि था. वे हमें बच्चा चोर कहने लगे.

बोले- 'आई कार्ड' दिखाओ. कहां से आए हो. फिर नाम पूछा. घर का पता पूछा. हमने अपनी पहचान बताई. लेकिन, वे नहीं माने. बोले-सबूत देना होगा.

पूरे परिवार को बुलाओ. यहां क्या करने आए थे. अपना 'आइडी प्रूफ' मंगवाओ. तुम लोग पेपर नहीं पढ़ता है. यहां बच्चा चोर घूम रहा है.

तब शाम के छह बज रहे होंगे. मैंने उन्हें अपनी 'आईडी' दिखाई, लेकिन वे नहीं माने. बोले, दोनों का 'आईडी प्रूफ़' चाहिए. मैंने कहा कि मेरा भाई है. वे तब भी नहीं माने.

फिर मैं विकास को वहीं छोड़कर आईडी प्रूफ़ लाने घर वापस आया. मैं उनकी मंशा से नावाकिफ था. मैंने घर से विकास की 'आईडी' निकाली.

तभी विकास ने मेरे मंझले भाई गौतम वर्मा को फोन करके वहां जल्दी पहुंचने की बात कही तो वह अपने दोस्त गंगेश गुप्ता और दादी रामसखी देवी को लेकर निकल पड़ा.

हमलोगों ने ये सोचा कि बूढ़ी औरत साथ रहेंगी तो उन पर ज़्यादा असर पड़ेगा. हम वहां पहुंचे तो नज़ारा कुछ और था. चारों तरफ हड़िया (आदिवासियों की शराब) की गंध थी.

कुछ लोगों ने शराब भी पी रखी थी. गांव के मुखिया उनका नेतृत्व कर रहे थे. ऐसा माहौल था मानो किसी की बलि चढ़ाई जाने वाली हो. उनलोगों ने हमें भी घेर लिया.

विकास तो पहले से ही उनके कब्ज़े में था. उनलोगों ने गौतम और गंगेश को भी बांध दिया. मेरी दादी और मुझे भी घेर लिया. फिर सबको पीटने लगे.

हमलोग बोले कि हमलोग बच्चा चोर नहीं हैं. आपको ग़लतफ़हमी हुई है. वे फिर भी हमें पीटने लगे. हमलोगों ने दादी को छोड़ देने का अनुरोध किया.

उनकी उम्र का हवाला दिया. लेकिन, हमारी कौन सुनता. मौत तांडव कर रही थी. हमने आईडी प्रूफ़ दिखाया. लेकिन सबके सर पर ख़ून सवार हो चुका था.

विकास, गौतम और गंगेश ख़ून से लथपथ हो चुके थे. उस दिन कोई भी जाता तो उसकी हत्या हो जाती. इसी दौरान प्रशासन की गाड़ी वहां पहुंची.

उसे देखकर हमारी हिम्मत बढ़ गई. हमलोगों ने सोचा कि पुलिस आ गई है तो हमारी जान बच जाएगी. मैं दादी को कंधे पर हाथ रखकर ले जा रहा था.

लेकिन, विकास और गौतम कूदकर पुलिस की गाड़ी में चढ़ गए. पुलिस ने कहा कि इन्हें छोड़ दो. अगर ये बच्चा चोर हैं तो इसका फैसला थाने में ही हो जाएगा.

तभी अचानक हज़ारों लोग रॉड से उन्हें पीटने लगे. विकास, गौतम और गंगेश को गाड़ी से निकाल कर पीटने लगे. उन पर रॉड से हमला किया. उनका ख़ून बहने लगा था.

लोगों ने पुलिस पर भी हमला कर दिया. मैं बुरी तरह डर गया. मैंने अपने भाई को मरते देखा.

मैं यह सोचकर धीरे-धीरे आगे बढ़ा कि अगर कोई नहीं देखेगा तो मेरी जान बच जाएगी. नहीं तो हम भी मारे जाएंगे. मैं वैसे ही निकल गया.

फिर घर आकर दोनों ने भाइयों की मौत की सूचना दी.

मेरी दादी अभी भी अस्पताल में हैं और हादसे के बाद से उन्होंने आंखें नहीं खोली है. वे बच जाएं तो यह चमत्कार ही होगा. हमारे लिए भगवान से प्रार्थना कीजिए.

एक रात विकास मेरे सपने में आया. रोकर कहने लगा कि लोग उसको बहुत मार रहे हैं. कुछ ही दिन पहले हमलोगो ने भगिनी का बर्थडे मनाया था. तब सब भाई साथ थे.

अब हम बेसहारा हो चुके हैं. कोई नहीं बचा मेरा. इसीलिए हमने अभी तक सरकार के मुआवज़े का चेक नहीं लिया. हमें दरअसल चेक नहीं न्याय चाहिए.

(स्थानीय पत्रकार रवि प्रकाश से हुई बातचीत पर आधारित)

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