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बुधवार, 24 जनवरी, 2007 को 08:06 GMT तक के समाचार
 
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'रामलीला हो गया है अब सत्याग्रह'
 

 
 
महात्मा गाँधी
सत्याग्रह की कोई उम्र नहीं होती, कोई पार्टी नहीं होती, कोई झंडा नहीं होता, न वह जीतता है और न हारता है. उसके लिए तो बस बड़ा मक़सद चाहिए और बड़ा दिल.

सत्याग्रह को बाँधा नहीं जा सकता. इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि सत्याग्रह गांधी जी की देन थी.

सत्याग्रह गांधी जी से पहले भी हुए थे और बाद में भी हुए और आगे भी होते रहेंगे.

गांधी जी ने बस इतना ही किया कि उन्होंने सत्याग्रह को लोगों तक पहुँचाया. कोई गाँव, कोई शहर, कोई जगह नहीं थी जहाँ गांधी जी का सत्याग्रह न पहुँचा हो.

दरअसल सत्याग्रह एक 'स्ट्रैटेजी' होती है. जिसे गांधी ने समझा था. वे ख़ुद गांधीवादी नहीं थे, उन्होंने सिर्फ़ सत्याग्रह के प्रयोग किए.

बदला समय

लेकिन अब तो सब कुछ बदल गया है.

वंदेमातरम को ही लें. एक समय था जब वंदेमातरम बोलना 'युद्धापराध' जैसा अपराध था और वंदेमातरम बोलना एक सत्याग्रह का हिस्सा था.

जो अपने देश के लिए बलिदान करना चाहते थे, क़ुर्बानी करना चाहते थे, वे वंदेमातरम कहते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) वाले वंदेमातरम को लेकर सत्याग्रह की बात करते हैं.

पूरे जीवन तो उन्होंने वंदेमातरम गाया नहीं, और कम से कम उस समय तो नहीं गाया जब पूरा देश वंदेमातरम गा रहा था. उस समय मोहम्मद अली जिन्ना तक से हमने वंदेमातरम गवा लिया.

जब सत्याग्रह का वक़्त था, तब तो कहा नहीं और अब सत्याग्रह की बात करते हैं.

 इस समय साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ सत्याग्रह की ज़रुरत है. जनसंख्या बढ़ती जा रही है और उसके ख़िलाफ़ कोई बात ही नहीं कर रहा है
 

ममता बनर्जी सत्याग्रह की बात करती हैं. वे पश्चिम बंगाल से कम्युनिज़्म को हटा देना चाहती हैं.

कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ मैं भी हूँ लेकिन मैं कम्युनिज़्म को नहीं हटाना चाहता. सच यह है कि उसे कोई ख़त्म नहीं कर सकता. जब-जब दुनिया के किसी हिस्से में शोषण होता दिखेगा तो कम्युनिज़्म या कम्युनिस्ट समाजवाद की बात होगी.

मैं मेधा पाटकर को जानता हूँ. मैं उस क्षेत्र से संसद सदस्य रहा हूँ. मैं उनके सत्याग्रह के बारे में, उनकी सहायता करने वाले लोगों के बारे में काफ़ी कुछ जानता हूँ. वह सत्याग्रह नहीं दुराग्रह है.

बड़ा मक़सद

अब तो सत्याग्रह रामलीला की तरह हो गई है. इसमें रामचंद्र जी असली तो होते नहीं है.

सत्याग्रह करने वाले लोगों को सुबह पुलिस पकड़कर ले जाती है और शाम को छोड़ देती है और लोग समझते हैं हो गया सत्याग्रह पूरा.

मैंने बिड़ला हाउस के सामने सत्याग्रह किया था. मैं चाहता था कि जहाँ गांधी जी का निधन हुआ वहाँ गांधीजी की स्मृति में स्मारक होना चाहिए. 10 दिनों में ही बिड़लाजी धराशाई हो गए. उन्होंने 55 लाख रुपए दिए.

सच यह है कि सत्याग्रह के लिए एक बड़ा मक़सद होना चाहिए और बड़ा दिल होना चाहिए.

इस समय सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सत्याग्रह की ज़रुरत है. जनसंख्या बढ़ती जा रही है और उसके ख़िलाफ़ कोई बात ही नहीं कर रहा है.

रुढ़िवाद के ख़िलाफ़ कोई आंदोलन नहीं चला रहा है.

सत्याग्रही कभी नहीं चाहता कि लोग उसे जानें, अख़बारों में उसका नाम आए. लेकिन अब सत्याग्रह का अर्थ ही बदला हुआ है.

यह राजनीतिक हथियार तो पहले भी था लेकिन अब इसका उपयोग सिर्फ़ राजनीति करने के लिए हो रहा है, समाज के लिए नहीं.

(मोहनलाल शर्मा से हुई बातचीत पर आधारित)

 
 
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