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सोमवार, 14 अगस्त, 2006 को 04:43 GMT तक के समाचार
 
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हिंदू के घर में बनी है मस्जिद
 

 
 
मस्जिद
इस मस्जिद में हर रोज मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अता करते हैं
पहली नज़र में ही लगता है कि यह मस्जिद कुछ ख़ास है. बाद में इसकी पुष्टि भी हो जाती है. जी हाँ, जिस मकान में यह मस्जिद बनी है और जहाँ लोग रोजाना नमाज़ अदा करते हैं, वह एक हिंदू परिवार का है.

यह सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन सच है. बारासात के बसु परिवार के मकान में बनी इस मस्जिद की देखभाल परिवार के सदस्य बीते लगभग 46 वर्षों से करते रहे हैं.

इस मस्जिद और बसु परिवार के प्रति इलाक़े के मुसलमानों में काफी आदर है. यह परिवार इतने लंबे अरसे से उनके इबादत स्थल का रखरखाव जो कर रहा है.

बसु परिवार के लोग इस मस्जिद की साफ़-सफ़ाई तो करते ही हैं, अल्पसंख्यक समुदाय के त्योहारों के मौके पर इसका रंग-रोगन भी कराते हैं.

देश के विभाजन के समय हज़ारों दूसरे परिवारों की तरह बसु परिवार भी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में खुलना से यहां आ गया था.

दोनों देशों के समझौते के तहत संपत्ति की अदला-बदली के तहत बारासात के नवपल्ली में इस परिवार को इस मकान के साथ 16 बीघे जमीन मिली थी.

यह संपत्ति शेख वाजुद्दीन मौला की थी. भारत में आने के बाद बसु परिवार ने देखा कि मकान में एक मस्जिद भी बनी है. कई अल्पसंख्यक संगठनों ने इस मस्जिद का जिम्मा लेना चाहा. लेकिन बसु परिवार ने इसे अपने नियंत्रण में ही रखा.

इस परिवार के दीपक बसु कहते हैं कि इस मस्जिद को गिराने की इच्छा ही नहीं हुई. अब इस मस्जिद की देखभाल दीपक के ज़िम्मे ही है.

रसोई गैस और मिट्टी तेल के कारोबार से जुड़े दीपक कहते हैं, "मस्जिद में नियमित तौर पर नमाज़ पढ़ी जाती है. यहां एक मौलवी भी हैं."

इज़्ज़त

दीपक पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उनके पिता नीरद कृष्ण बसु चटगाँव बंदरगाह में अधिकारी थे. उनका पुश्तैनी मकान खुलना ज़िले के फूलतला गांव में था.

दीपक
जब तक मैं हूँ, इस मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आने वालों को कोई दिक़्क़त नहीं होगी

वे 1965 में अपने दोनों पुत्रों अरुण और दीपक के साथ भारत चले आए और यहाँ मिली जमीन में बने मस्जिद को अपनाने का फ़ैसला कर लिया.

अब बसु परिवार की यह मस्जिद इलाके में सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल बन गई है.

मस्जिद के मौलवी अख़्तर अली भी इस बात की पुष्टि करते हैं. अली बताते हैं, "इसका श्रेय दीपक को है. वे मस्जिद के पूरे साल का ख़र्च उठाते हैं. बसु परिवार हमारे लिए एक आदर्श है."

दीपक कहते हैं, "मैं हिंदू होने के कारण नमाज तो नहीं पढ़ता. लेकिन इस मस्जिद को अपने हाथों से साफ़ करता हूँ और ईद के दौरान रोज इफ़्तार पार्टी आयोजित करता हूँ."

वे कहते हैं, "खुलना के अपने गांव में हमने सांप्रदायिक सदभाव की यही तस्वीर देखी है. जब तक मैं हूँ, इस मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आने वालों को कोई दिक़्कत नहीं होगी."

अब जब ज़मीन की क़ीमत आसमान छू रही है, दीपक इस मस्जिद की जमीन को किसी भी क़ीमत पर बेचने को तैयार नहीं हैं. वे कहते हैं, "हम तो इसे दोमंज़िला बनाने की सोच रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी कोई दिक़्क़त नहीं हो."

 
 
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