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बुधवार, 25 मई, 2005 को 09:45 GMT तक के समाचार
 
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संघर्ष और चुनौतियों से भरा जीवन
 

 
 
सुनील दत्त
सुनील दत्त ने एक पत्रकार के रुप में शुरुआत की थी
जब मैं सुनील दत्त की जीवनी पर काम करना चाहती थी तो उनके एक मित्र राज ग्रोवर ने मुझे उनसे मिलवाया था.

उससे पहले मैं जब दो-चार बार संजय दत्त का साक्षात्कार करने गई थी तो उनको देखा था.

लेकिन जब उन्होंने जीवनी के लिए लंबा समय दिया और अपनी जीवन कथा मुझे सुनाई तो मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला क्योंकि उनका जीवन बहुत संघर्ष और चुनौतियों से भरा हुआ था.

यह ख़बर जो आई है वह बहुत बुरी लग रही है क्योंकि एक युग अब समाप्त हो गया है.

यह मानना कठिन लगता है कि एक ऐसे व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा जिसका दिल बहुत बड़ा और उदार था, जिसके दिल में पीड़ित लोगों के लिए बहुत दर्द था.

अभिनेता और व्यक्तित्व

अपनी अभिनय क्षमता को लेकर वे बेहद व्यावहारिक थे और वे जानते थे कि वे निर्देशक के कलाकार हैं.

शायद इसीलिए उन्होंने अपने निर्देशक चुनने में बहुत सतर्कता से काम लिया. बिमल रॉय से लेकर हृषिकेश मुखर्जी और बीआर चोपड़ा तक.

सुनील दत्त अपने बेटे संजय दत्त के साथ फ़िल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में

एक अभिनेता के रुप में पर्दे पर उनकी उपस्थिति बेहद जीवंत होती थी. एक अलग तरीक़ा होता था, एक भोलापन था.

लेकिन वे निर्देशक के रुप में वे बहुत प्रभावशाली थे.

उनकी फ़िल्मों में सुजाता, मदर इंडिया, मुझे जीने दो, पड़ोसी और ज़ख़्मी ऐसी फ़िल्में हैं जिसे मैं बार-बार देखना चाहूँगी.

मेरी रुचि राजनीति में नहीं है और मैं राजनीति में लिखती नहीं इसलिए मैं उनके इस व्यक्तित्व के बारे में नहीं बता सकती.

मैं उन्हें एक अभिनेता और एक निर्देशक के रुप में जानती थी और बाद में एक अभिनेता के पिता के रुप में भी मैं उनसे परिचित हुई.

लेकिन मेरा मानना है कि उन्हें जीवन में जो कुछ मिला वह उनके अभिनेता होने के कारण मिला इसलिए मैं उसे अहम मानती हूँ.

दिल छू लेने वाली बातें

उनकी जीवनी लिखते वक्त उन्होंने कुछ बाते बताईं जो मुझे बार बार याद आती हैं.

 आदमी का पढ़ना लिखना इसलिए ज़रूरी नहीं है कि वह यह जान जाए कि कौन सी चोटी सबसे ऊँची है या सबसे बड़ी नदी कौन सी है बल्कि पढ़ना इसलिए भी ज़रुरी है क्योंकि इससे आप सीखते हैं कि जीवन के कठिन मोड़ों पर या ज़िंदगी जब आपसे रुठी हुई हो तो आपको कैसे निर्णय लेने हैं
 

एक ऐसा दौर था जब उनके पास बिल्कुल पैसा नहीं था और फ़िल्में भी नहीं थीं. उस वक्त उनके सामने अपना मकान बेचने की नौबत आ गई थी.

उस समय उन्होंने एक वकील रखा और उनके वकील ने उनसे पूछा कि उनकी संपत्ति क्या है तो सुनील दत्त साहब ने उनसे कहा कि संपत्ति के नाम पर सिर्फ़ वही हैं और इस पर उनके वकील ने कहा कि उन्हें अपनी संपत्ति का उपयोग करके ही पैसा वापस कमाना पड़ेगा.

और उन्होंने फ़िल्मों में फिर काम करना शुरु किया और पैसा कमाया.

उसी दौर में उन्हें 'मैं चुप रहूँगी' फ़िल्म मिली थी. एक आदमी उनसे मिलने घर आया था तो नर्गिस दत्त ने उसे रेलवे स्टेशन भेज दिया क्योंकि सुनील दत्त ट्रेन से चेन्नई जाने वाले थे. वह आदमी फ़िल्म का प्रस्ताव लेकर आया था.

दूसरी एक बात उन्होंने कही थी जो बार-बार याद आती है.

उन्होंने कहा था कि आदमी का पढ़ना-लिखना इसलिए ज़रूरी नहीं है कि वह यह जान जाए कि कौन सी चोटी सबसे ऊँची है या सबसे बड़ी नदी कौन सी है बल्कि पढ़ना इसलिए भी ज़रुरी है क्योंकि इससे आप सीखते हैं कि जीवन के कठिन मोड़ों पर या ज़िंदगी जब आपसे रुठी हुई हो तो आपको कैसे निर्णय लेने हैं.

(भावना सोमैया ने 'जी' पत्रिका के संपादक के रुप में सुनील दत्त की जीवनी लिखी थी. यह आलेख विनोद वर्मा से फ़ोन पर हुई बातचीत के आधार पर लिखा गया)

 
 
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