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शुक्रवार, 28 जनवरी, 2005 को 14:35 GMT तक के समाचार
 
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फ़िल्म 'ब्लैक फ्राइडे' विवादों में घिरी
 
ब्लैक फ्राइडे
फ़िल्म के केंद्र में मुंबई के बम धमाके हैं
महाराष्ट्र में मुंबई में 12 मार्च, 1993 में हुए बम धमाकों पर बनी बॉलीवुड फ़िल्म 'ब्लैक फ़्राइडे' को दर्शकों तक पहुंचने के लिए लगता है कुछ और शुक्रवारों का इंतज़ार करना पड़ेगा.

निर्देशक अनुराग कश्यप की इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर मुंबई उच्च न्यायालय ने इस धमाके के अभियुक्तों की याचिका सुनकर तीन फ़रवरी तक रोक लगा दी है.

फ़िल्म के निर्माताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है.

ये फ़िल्म 12 मार्च, 1993 को मुंबई में हुए धमाकों पर पत्रकार एस हुसैन ज़ैदी की दो साल पहले लिखी क़िताब पर आधारित है.

यह फ़िल्म शुक्रवार, 28 जनवरी, 2005 को प्रदर्शित होने वाली थी लेकिन उन धमाकों के अभियुक्तों ने कोर्ट में दलील पेश की है कि जब तक इस मामले में अंतिम फ़ैसला नहीं आ जाता तब तक इस फ़िल्म को रिलीज़ नहीं किया जाना चाहिए.

फ़िल्म निर्माताओं का कहना है जब ये क़िताब दो साल से बाज़ार में उपलब्ध है तो फिर इस पर बनी फ़िल्म पर आपत्ति क्यों?

सच्चाई क्या है?
 जब अदालत ही असली कहानी नहीं ढूंढ पाई है तो फिर ये फ़िल्म इस तरह का दावा कैसे कर सकती है. यदि ये दर्शकों तक पहुँच जाती है तो लोग इसे ही सच मान बैठेंगे और अदालत के फ़ैसले पर विश्वास नहीं करेंगे.
 
माजिद मेमन, वकील

निर्देशक अनुराग कश्यप के वकील मिहिर देसाई ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "यदि क़िताब पर कोई एतराज़ नहीं किया गया तो फिर इस फ़िल्म के ख़िलाफ़ कैसे किया जा सकता है ?’’

अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों के दौरान मार्च 1993 में हुए उन धमाकों में लगभग 300 लोग मारे गए थे और एक हज़ार से भी ज़्यादा घायल हो गए थे.

य दूसरा मौक़ा है जब इन अभियुक्तों ने इस फ़िल्म पर आपत्ति उठाई है. पहली बार उन्होंने अदालत का दरवाज़ा तब खटखटाया था जब फ़िल्म निर्माताओं ने इसके पोस्टर पर लिखा था - 'ब्लैक फ़्राइडे मुंबई धमाकों की असली कहानी'.

इस मामले के 36 अभियुक्तों का कहना था कि पोस्टर से "मुंबई धमाकों की असली कहानी" को हटाया जाए.

उनके वकील माजिद मेमन का कहना था, "जब अदालत ही असली कहानी नहीं ढूंढ पाई है तो फिर ये फ़िल्म इस तरह का दावा कैसे कर सकती है. यदि ये दर्शकों तक पहुँच जाती है तो लोग इसे ही सच मान बैठेंगे और अदालत के फ़ैसले पर विश्वास नहीं करेंगे."

 
 
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