'हैप्पी न्यू ईयर': ज्यादा मज़ा, थोड़ी सज़ा

हैप्पी न्यू ईयर, फिल्म

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आप उस फ़िल्म के बारे में क्या कहेंगे जिसमें कई मसाले हों. यानी एक बड़ी चोरी, वर्ल्ड डांसिंग चैंपियनशिप और कुछ पारिवारिक झमेले.

क्या इसे टीवी सीरियल 'सीआईडी' और 'नच बलिए' का मिला-जुला रूप कहें?

या यह 80 और 90 के दशक की हिंदी फ़िल्मों के दौर की मिथुन दा की 'डांस डांस' में अनिल कपूर की 'रूप की रानी चोरों का राजा' का कॉकटेल?

जो भी हो, फ़िल्म का निर्देशन किया है फराह ख़ान ने. इसका सीधा मतलब यह है यदि यह 'ओम शांति ओम' जैसी हुई तो दर्शक पागल हो उठेंगे, क्योंकि तब इसमें होगा ढेर सारा इश्क़ और विश्वास. और यदि बहुत बुरी हुई तो यह एक फालतू और बेतुकी फ़िल्म (तीस मार खां) हो सकती है.

'हैप्पी न्यू ईयर' बाद वाली फ़िल्म की अपेक्षा पहले वाली फ़िल्म की तरफ जाती दिखती है.

यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं. अचरज बस इस बात का नहीं है कि शाहरुख ख़ान श्रद्धांजलि देते हुए पर्दे पर आते हैं.

शाहरुख का 8-पैक ऐब्स

फिल्म में शाहरुख 'चार्ली' का किरदार निभा रहे हैं जो पर्दे पर 8-पैक ऐब्स के साथ उतरता है. वह कई मशहूर डॉयलाग बोलता हुआ दिखता है.

चार्ली कहता है, "बड़ी-बड़ी फ़ाइट में छोटी-छोटी चोट लगती रहती है" (डीडीएलजे), “कौन कमबख्त बर्दाश्त करने के लिए पीता है” (देवदास); “ईमानदारी से कमाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है” (डॉन).

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बीच-बीच में शाहरुख खान कई ज़रूरी सीख भी देते रहते हैं. जैसे कि यह दुनिया दो तरह के इंसानों से बनी है. एक सफल, दूसरा असफल.

शाहरुख फ़िल्म में यह कहते हुए दिखते हैं कि वे हारे हुए खिलाड़ी हैं, हालांकि यह समझ पाना मुश्किल है कि ऐसा क्यों है?

क्योंकि फ़िल्म में शाहरुख ख़ान बॉस्टन यूनिवर्सिटी के टॉपर हैं, पेशेवर मुक्केबाज़ हैं और डांस करने में उतने भी बुरे नहीं हैं.

वे सुपर-फ़िट हैं. कुछ ही दिनों में 49 साल का होने वाला ऐसा व्यक्ति जिसे दुनिया भर में उसके चाहने वाले अपना सुपरस्टार मानते हैं.

'मेरा बाप चोर है'

फ़िल्म में शाहरुख ख़ान यानी 'चार्ली' के खुद को हारा हुआ महसूस करने की एक ही वजह है और वो यह कि उसके पिता को दुर्भाग्यवश चोर मान लिया जाता है.

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खलनायक (जैकी श्रॉफ़) की साज़िश के कारण 'चार्ली' के पिता को जेल हो जाती है. उस ग़लती को ठीक करने में उसे आठ साल लग जाते हैं.

'चार्ली' बदला लेने के लिए खलनायक से क़ीमती हीरा चुरा लेना चाहता है. यह हीरा एक होटल के कमरे में हिफ़ाज़त से रखा हुआ है. होटल ने 'वर्ल्ड डांस प्रतियोगिता' भी आयोजित की है.

'हैप्पी न्यू ईयर' में कई दृश्य और डॉयलाग ऐसे हैं, जो बॉलीवुड की दूसरी फ़िल्मों की याद दिलाते हैं. जैसे 'मेरा बाप चोर है' से अमिताभ बच्चन की फिल्म 'दीवार' (1975) की याद आती है.

वह तिजोरी जिसमें बेशक़ीमती हीरा रखा है, उसका नाम 'शालीमार' है. धर्मेंद-जीनत (1978) अभिनीत फ़िल्म का भी यही नाम था. शीर्षक गीत पूरी फ़िल्म में पृष्ठभूमि में बजता रहता है.

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'हम किसी से कम नहीं'(1977) फ़िल्म की ही तरह चोरी के ठीक पहले एक रोचक और मजेदार डांस मुक़ाबला होता है. अर्जुन (1985) की स्टाइल में गाना और एक्शन सीन ‘ममैया केरो केरे मामा’ भी.

और आखिर में सभी जीत की खुशी में जो डांस करते हैं, वो सन्नी देओल की फिल्म 'जीत' (1996) को समर्पित है.

डांस, ड्रामा, ऐक्शन

इतनी फ़िल्मों के संदर्भ देने के पीछे मक़सद ये बताना है कि यह दूसरी बॉलीवुड फिल्मों की ही तरह एक आम बॉलीवुड फ़िल्म है, यानी नाच-गाने और मसाले से भरपूर फ़िल्म. इसे एक श्रद्धांजलि बताना इसे कम आंकने जैसा होगा.

पश्चिम के लोग फिल्मों में इतना डांस, ड्रामा, ऐक्शन और ओवरएक्टिंग बर्दाश्त नहीं करते. और अब तो बॉलीवुड में भी ऐसी फ़िल्में कम बनने लगी हैं.

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इसलिए सबसे अच्छा होगा कि हम इसे बॉलीवुड को दी जाने वाली श्रद्धांजलि कहें.

फिल्म में डांस सिखाने वाली, मुख्य भूमिका निभा रही दीपिका पादुकोण को देखकर 'तेज़ाब' (1983) की मोहिनी की याद आती है.

फिल्म में चोरों की टोली का बेहद अहम सदस्य हैं अभिषेक बच्चन. उन्होंने दोहरी भूमिका निभाई है. बिलकुल अपने पिता के 'डॉन' (1978) की तरह जो एक तरफ तो खांटी देहाती है, तो दूसरी तरफ संभ्रात शहरी.

सोनू सूद, बोमन ईरानी और विवान शाह जैसे अभिनेताओं ने सनकी किरदारों की भूमिका बखूबी निभाई है. शाहरुख ख़ान की फिल्म में सबने अपनी अच्छी छाप छोड़ी है.

'हाउसफ़ुल'

दर्शक के बतौर थियेटर जाने से पहले फ़िल्म से कोई खास उम्मीद नहीं थी. जबकि बाहर 'हाउसफ़ुल' का बोर्ड लगा था.

सबसे पहली बात तो यह कि दर्शक जानता है कि फ़िल्म तीन घंटे की है. फिर निदेशक के बतौर फ़राह ख़ान की पिछली फ़िल्म 'तीस मार खां' थी.

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यह सब जानने के बावजूद जैसे-जैसे आप फ़िल्म में रमने लगते हैं, कई दृश्यों पर मुस्कुराहट खिल उठती है. हॉल में मौजूद अधिकतर दर्शक मज़ा ले रहे होते हैं.

हां, जब ड्रामा, डांस ज़्यादा होने लगता है तो वे बीच-बीच में इधर-उधर झांकने लगते हैं. कई दृश्य आपको ऐसा करने को मजबूर कर देते हैं.

और आख़िर में जब आप हॉल से निकलकर गली में आते हैं, तो यह महसूस होता है कि भले हंस-हंसकर फर्श पर लोटपोट न हुए हों, फिर भी फ़िल्म में रुचि अंत तक बनी रहती है.

यह एक अच्छी फ़िल्म है, और इसके ज़्यादातर हिस्से मज़ेदार हैं.

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