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शुक्रवार, 21 मई, 2004 को 06:25 GMT तक के समाचार
 
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तेल क़ीमतों में बढ़ोत्तरी से चिंता बढ़ी
 
तेल का कुँआ
तेल आपूर्ति पर ओपेक का निर्णायक नियंत्रण है
कच्चे तेल की क़ीमतों में हुई भारी वृद्धि को देखते हुए तेल निर्यातक देशों पर तेल आपूर्ति बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है.

ब्रिटेन के वित्त मंत्री गोर्डन ब्राउन ने कहा है कि ऐसे हालात में यह ज़रूरी है कि तेल निर्यातक देशों का संगठन ओपेक तेल बाज़ार में स्थिरता लाने के लिए ज़रूरी क़दम जल्दी उठाए.

अमरीका के ऊर्जा मंत्री स्पेंसर अब्राहम ने भी तेल निर्यातक देशों से अनुरोध किया है कि उन्होंने हाल ही में जो तेल कोटा में कटौती की थी उसे वापस ले लें और उत्पादन बढ़ा दें.

हाल के सप्ताहों में तेल की क़ीमतों में ख़ासी बढ़ोत्तरी हुई है और यह चालीस डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुँची है जो पिछले क़रीब 21 साल में सबसे ऊँची है.

ओपेक के संगठन देश इस सप्ताहांत इस मसले पर विचार कर रहे है लेकिन उनमें से बहुत से इस पर कोई क़दम उठाने से क़तरा रहे हैं.

कहा यह जा रहा है कि वे कोई क़दम इसलिए उठाने से बच रहे हैं क्योंकि वे यह नहीं दिखाना चाहते कि उन्होंने पश्चिमी देशों के दबाव में आकर कोई फ़ैसला लिया है.

ओपेक के अध्यक्ष पूर्नोमो यासगियांतोरो ने कहा है कि वे ख़ुद भी नहीं चाहते कि तेल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी हो लेकिन उपभोक्ता देश ख़ुद भी करों में कमी करके समस्या को काफ़ी हद तक सुलझा सकते हैं.

इस संकट पर विचार करने के लिए सात विकसित देशों के नेता भी इस सप्ताहांत बैठक कर रहे हैं.

यूरोपीय संघ ने भी कहा है कि आपूर्ति बढ़ाए जाने की सख़्त ज़रूरत है.

ओपेक के अध्यक्ष ने कहा है कि 2000 में प्रति बैरल 22 से 28 डॉलर क़ीमत निर्धारित की गई थी लेकिन हाल के समय में महंगाई बढ़ने और डॉलर की क़ीमत में आई गिरावट की वजह से तेल की क़ीमतें बढ़ी हैं.

उन्होंने कहा कि ओपेक अपनी क्षमता का 85 से 95 प्रतिशत के बराबर तेल उत्पादन कर रहा है और इसमें और बढ़ोत्तरी किए जाने की गुंजाइश ही नहीं है.

 
 
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