केरल चुनाव: इस बार क्या पहले से हटकर होगा मुक़ाबला, ईरान जंग का भी दिख सकता है साया

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इमेज कैप्शन, केरल विधानसभा चुनाव बेहद अहम पड़ाव पर पहुँच गया है
    • Author, जेवियर सेल्वाकुमार
    • पदनाम, संवाददाता बीबीसी तमिल
  • पढ़ने का समय: 13 मिनट

केरल के विधानसभा चुनावों में अब तक ज़्यादातर दो-तरफ़ा मुक़ाबले देखने को मिले हैं

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में पहली बार एक मज़बूत 'त्रिकोणीय मुक़ाबला' हो सकता है.

पिछले 10 साल से केरल की सत्ता संभाल रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ़) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ़) के अलावा, इस चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) भी पूरी ताक़त से मैदान में उतर आया है.

राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस को हराने के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और बीजेपी के बीच एक 'गुप्त गठजोड़' है.

वहीं सीपीएम के समन्वयक विजय राघवन ने बीबीसी से कहा कि केरल में जब-जब बीजेपी को जीत मिली है, तब-तब वह कांग्रेस की परोक्ष सहमति से ही मिली है, और कांग्रेस ने जो भी चुनावी वादे किए हैं, उन्हें पूरा किया ही नहीं जा सकता.

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वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार केरल आकर प्रचार कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद बीजेपी सिर्फ़ 30 सीटों पर ही खास ध्यान केंद्रित कर रही है.

उनके मुताबिक़, त्रिकोणीय मुक़ाबला होने के बावजूद राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनने की संभावना नहीं है.

पिनराई विजयन के लिए पार्टी नियमों में ढील

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इमेज कैप्शन, पिनराई विजयन को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी बनाया गया है (फ़ाइल फ़ोटो)

केरल में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान एक ही चरण में 9 अप्रैल को होगा.

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140 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में अंतिम मतदाता सूची के अनुसार क़रीब 2.7 करोड़ मतदाता हैं.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उस नियम में ढील दी गई है, जिसमें कहा गया था कि कोई नेता मुख्यमंत्री जैसे पद पर दो कार्यकाल से ज़्यादा नहीं रह सकता.

इसी वजह से पिनराई विजयन, पूर्व मंत्री शैलजा समेत कई नेताओं को तीसरी बार मौक़ा दिया गया है. पिनराई विजयन को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी बनाया गया है.

सोनिया गांधी की तबियत ठीक नहीं होने के कारण, कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केरल में 'पुथुयुग यात्रा' निकालकर प्रचार किया.

प्रियंका गांधी भी प्रचार अभियान में हिस्सा ले रही हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में पलक्कड़ में प्रचार कर चुके हैं और त्रिशूर में रोड शो में भाग लेने के बाद तिरुवनंतपुरम में भी चुनाव प्रचार किया है.

इससे केरल विधानसभा चुनाव अब एक बेहद अहम दौर में पहुँच गया है.

आमतौर पर केरल के चुनावों में सिर्फ़ दो-तरफ़ा मुक़ाबला ही होता रहा है, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार का कहना है कि इस बार के चुनाव को पहली बार 'त्रिकोणीय मुक़ाबला' कहा जा सकता है.

हालाँकि उनका यह भी कहना है कि ऐसा मुक़ाबला सिर्फ़ 30 सीटों पर ही है, और असली टक्कर अब भी पारंपरिक दो गठबंधनों के बीच है.

बीबीसी तमिल से बात करते हुए प्रदीप कुमार कहते हैं, "पिछले 10 सालों में बीजेपी केरल में धीरे-धीरे बढ़ी है. त्रिशूर लोकसभा सीट से अभिनेता सुरेश गोपी ने जीत हासिल की. हाल ही में बीजेपी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्ज़ा किया. 2024 के लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत के लिहाज़ से कई विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी पहले स्थान पर रही, जबकि कुछ में दूसरे स्थान पर. इसी वजह से बीजेपी 30 सीटों पर ज़्यादा ध्यान दे रही है."

केरल के पत्रकार प्रमोद गोपु का कहना है कि भले ही मुक़ाबला त्रिकोणीय हो, लेकिन केरल चुनाव में जीत–हार का फ़ैसला सिर्फ़ पाँच कारणों से होगा.

वे इन कारणों के तौर पर सत्ता विरोधी लहर, बीजेपी के वोट बैंक का असर, पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण खाड़ी देशों में रह रहे मलयालियों को होने वाली परेशानियाँ, अल्पसंख्यकों के वोट और चुनावी वादों को गिनाते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए प्रमोद ने कहा, "वाम लोकतांत्रिक मोर्चे का पहले पाँच साल का शासन काफ़ी अच्छा रहा. कोविड महामारी और बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान सरकार ने बेहतर काम किया. विकास कार्य तेज़ी से हुए. लेकिन पिछले पाँच सालों में कोई बड़ी विकास योजना नहीं दिखी. भ्रष्टाचार के आरोप लगे, क़र्ज़ का बोझ बढ़ गया. सरकार के ख़िलाफ़ लोगों में नाराज़गी बढ़ी है."

केरल विधानसभा चुनाव पर विशेष लेख प्रकाशित करने वाली पत्रिका फ़्रंटलाइन ने कई बातों की ओर इशारा करते हुए लिखा है, "वाम लोकतांत्रिक मोर्चा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ रहा है. वहीं संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ), पार्टी के अंदरूनी मतभेदों के बावजूद, व्यक्तिगत उम्मीदवारों की पकड़ को अहमियत दे रहा है."

बीजेपी अपने हिंदुत्व समर्थक आधार से आगे बढ़कर लड़ने की कोशिश कर रही है.

लोकसभा चुनाव के नतीजे संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे के दबदबे को दिखाते हैं.

सभी दलों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और स्थानीय मुद्दों का असर शामिल है.

वरिष्ठ पत्रकार आरके राधाकृष्णन ने बताया कि उन्होंने केरल में लगातार यात्राएँ कर अलग-अलग तबकों के लोगों से मुलाक़ात करने के बाद ही यह लेख लिखा है.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कई पहलुओं को साझा किया. राधाकृष्णन का कहना है कि अल्पसंख्यकों के वोट और पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में चल रहे संघर्ष से पैदा हुईं स्थितियाँ इस चुनाव को प्रभावित करेंगी.

उन्होंने कहा, "सत्ताधारी दल के ख़िलाफ़ विरोध की लहर, पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में इस बार ज़्यादा दिखाई दे रही है. लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने भी यही संकेत दिया था. इन्हें देखते हुए कांग्रेस मज़बूत होती नज़र आती है, लेकिन पार्टी के अंदरूनी विवाद उसे कमज़ोर कर रहे हैं."

युद्ध और भू राजनीति का केरल चुनाव में असर पड़ने की संभावना

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इमेज कैप्शन, करीब 30 लाख मलयाली लोग विदेशों में काम करते हैं (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केरल से जुड़े लाखों लोग खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों में काम कर रहे हैं.

प्रवासी केरलवासियों के लिए एक अलग विभाग 'नोरका' (डिपार्टमेंट ऑफ़ नॉन रेजिडेंट्स केरलाइट्स अफ़ेयर्स) भी काम करता है.

राधाकृष्णन के मुताबिक़, विदेशों में रहने वाले क़रीब 30 लाख मलयाली लोगों में से बड़ी संख्या संयुक्त अरब अमीरात में काम करती है.

वहाँ ईरान की ओर से किए जा रहे हमलों ने केरल के लोगों के मन में जान-माल की सुरक्षा को लेकर चिंता और बड़े पैमाने पर रोज़गार छिनने के डर को बढ़ा दिया है.

राधाकृष्णन कहते हैं, "केरल 90 प्रतिशत से ज़्यादा साक्षरता वाला राज्य है. वहाँ के लोग भू-राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं. विदेशों पर निर्भर इन 30 लाख लोगों में से क़रीब 10 लाख लोग इस चुनाव में वोट डाल सकते हैं. उनसे जुड़े परिवारों के वोट भी उनकी सोच को ही दर्शाएँगे. भले ही यह जीत का अकेला फ़ैसला करने वाला कारण न हो, लेकिन इसका असर काफ़ी अहम होगा. इस समय मध्य-पूर्व में जो युद्ध जैसी स्थिति चल रही है, उसकी गूँज इस चुनाव में सुनाई देगी. ख़ास तौर पर यह बीजेपी को पीछे खींचने वाला एक बड़ा कारण बनेगा."

हालाँकि, केरल के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार का कहना है कि पिछले 10 सालों में केरल में बीजेपी धीरे-धीरे बढ़ी है, लेकिन इस चुनाव में पार्टी सिर्फ़ 30 सीटों को ही लक्ष्य बना रही है.

उनके मुताबिक़, इनमें तिरुवनंतपुरम की तीन सीटें, पलक्कड़, कासरगोड और त्रिशूर ज़िलों की एक-एक सीट- यानी कुल मिलाकर तीन से छह सीटों पर बीजेपी का दबदबा बन सकता है.

प्रदीप कुमार कहते हैं, "केरल में बीजेपी के समर्थकों की दो तरह की श्रेणियाँ हैं- मोदी के कट्टर समर्थक और स्थानीय मुद्दों के लिए संघर्ष करने वाले लोग."

वह बताते हैं कि केरल की आबादी में एक अहम हिस्सा रखने वाले हिंदू ईझवा समुदाय का संगठन भी बीजेपी गठबंधन में शामिल हो चुका है.

जो ईझवा समुदाय कभी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन करता था, वह अब बीजेपी की ओर झुक गया है. भारत धर्म जनसेना (बीडीजेएस) के ज़रिए बीजेपी का साथ देने वाले ये लोग अब सीधे बीजेपी में शामिल होते जा रहे हैं.

प्रदीप कुमार का कहना है कि इस चुनाव में सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के ख़िलाफ़ विरोध से ज़्यादा, मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की नेतृत्व शैली आलोचनाओं के घेरे में ज़्यादा है.

वह कहते हैं कि पार्टी में दूसरे स्तर के नेताओं को आगे बढ़ने का मौक़ा न देने और ख़ास तौर पर कोविड काल में स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए बेहतरीन काम करने वाली शैलजा को चुनावों में हार का सामना करना पड़ा,

इन सबके पीछे भी पिनराई विजयन की भूमिका होने का शक कई लोग जताते हैं.

इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य समन्वयक विजय राघवन ने कहा, "पिनराई विजयन सीपीएम का एक बड़ा चेहरा हैं, इसलिए उनकी ज़्यादा तीखी आलोचना होती है. केरल में त्रिकोणीय मुक़ाबले की बात ही ग़लत है. त्रिशूर और स्थानीय निकाय चुनावों में जो हुआ, वह दोबारा नहीं होगा. वहाँ बीजेपी को कांग्रेस की मदद से जीत मिली थी. इस चुनाव में सीधा मुक़ाबला सिर्फ़ एलडीएफ़ और यूडीएफ़ के बीच ही है."

हाल ही में केरल में चुनाव प्रचार कर चुके राहुल गांधी ने कहा था, "केरल में सीपीएम ने बीजेपी के साथ मिलकर 'सीजेपी' बना लिया है. मुझ पर 36 मामले दर्ज हैं, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय मुख्यमंत्री और उनके परिवार के ख़िलाफ़ बड़े मामलों में जाँच नहीं कर रहा? दोनों पक्षों के बीच मिलीभगत के बारे में केरल की जनता जानती है."

इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस आइज़क ने सवाल उठाया, "किस आधार पर वे सीपीएम पर बीजेपी के साथ गठजोड़ का आरोप लगा रहे हैं? या क्या वह यह चाहते हैं कि प्रवर्तन निदेशालय हमारे मुख्यमंत्री की जाँच करे?"

इसी तरह के सवाल उठाते हुए विजय राघवन ने भी कहा, "केरल में जब भी, जहाँ भी बीजेपी को जीत मिली है, उसके पीछे कांग्रेस ही रही है."

विजय राघवन की पत्नी बिंदु केरल सरकार में उच्च शिक्षा और सामाजिक कल्याण मंत्री हैं.

अल्पसंख्यकों के वोट किस गठबंधन को ज़्यादा मिलेंगे?

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इमेज कैप्शन, पिनराई विजयन को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी बनाया गया है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केरल में चुनावी मैदान में आमने-सामने खड़े तीन गठबंधनों में से सिर्फ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पिनराई विजयन का नाम घोषित किया है.

संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन- दोनों ने अब तक मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है.

हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार का कहना है कि केरल की जनता में आम तौर पर मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर बहुत ज़्यादा उत्सुकता नहीं होती.

इस बारे में बीबीसी तमिल से बात करते हुए कांग्रेस पार्टी के पलक्कड़ लोकसभा सांसद श्रीकांतन ने कहा, "कांग्रेस पार्टी के मामले में मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका फ़ैसला चुनाव के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा. सतीशन, रमेश चेन्निथला समेत केरल कांग्रेस में कई ऐसे नेता हैं, जिनमें मुख्यमंत्री बनने की योग्यता है. असल में व्यक्ति केंद्रित राजनीति तो प्रतिद्वंद्वी खेमे में है."

हालाँकि पिनराई विजयन को लेकर नाराज़गी ज़रूर है, लेकिन प्रदीप कुमार का कहना है कि पार्टी के निचले स्तर के नेता और जनप्रतिनिधि लोगों के बीच रहकर काम कर रहे हैं, और यही वजह है कि पार्टी के प्रति भरोसा अब भी बना हुआ है.

वहीं पत्रकार राधाकृष्णन का कहना है कि "पिनराई विजयन के अलावा इस समय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पास मुख्यमंत्री पद का कोई और चेहरा नहीं है."

केरल में बड़ी संख्या में मौजूद अल्पसंख्यक वोट किस गठबंधन के पक्ष में जाएँगे- इसे भी इस चुनाव में जीत का फ़ैसला करने वाले अहम कारण के तौर पर देखा जा रहा है.

केरल के पत्रकार अमीर का कहना है कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग समेत ज़्यादातर इस्लामी पार्टियाँ और संगठन संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ़) का समर्थन कर रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में अमीर ने बताया, "केरल में हिंदू ईझवा समुदाय, जो पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक माने जाते थे, हाल के दिनों में बीजेपी की ओर झुकने लगे हैं. उस वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में सीपीएम नेताओं के कुछ बयानों और भाषणों ने केरल के मुस्लिम समुदाय को काफ़ी आहत किया है. केरल की प्रमुख मुस्लिम पार्टियाँ और संगठन कांग्रेस गठबंधन के साथ खड़े हैं, इसलिए बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट यूडीएफ़ को मिलने की संभावना है."

केरल की आबादी में 18 प्रतिशत से भी ज़्यादा हिस्सेदारी रखने वाले ईसाई समुदाय के वोट किसे मिलेंगे, यह सवाल भी इस चुनाव में बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है.

सिरो मलाबार, लैटिन कैथोलिक, सिरो मलंकड़ा, सीरियन ऑर्थोडॉक्स, सीरियन मार थोमा, सीएसआई, पेंटेकोस्टल जैसे अलग-अलग ईसाई संप्रदायों से जुड़े लोग राज्य के कई ज़िलों में फैले हुए हैं.

राधाकृष्णन के अनुसार, "केरल के ईसाई समुदाय में बहुसंख्यक कैथोलिक वर्ग इस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में झुकता दिख रहा है. लेकिन व्यापार और उद्योग से जुड़े ईसाई समुदाय बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं. वे कहते हैं कि इस्लामी व्यापारियों के साथ कारोबारी प्रतिस्पर्धा के चलते उन्हें बीजेपी के साथ खड़ा होना पड़ रहा है."

इन सबके अलावा, तीनों गठबंधनों के प्रमुख चुनावी वादे भी चुनावी बहस का केंद्र बने हुए हैं.

कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र में शामिल 'इंदिरा गारंटी' योजनाओं पर चर्चा ज़रूर हो रही है, लेकिन पत्रकार प्रदीप कुमार का कहना है कि लोग क़र्ज़ के बोझ को लेकर भी सोचेंगे.

उनके मुताबिक, त्रिकोणीय मुक़ाबला होने के बावजूद त्रिशंकु विधानसभा बनने की संभावना नहीं है. यही राय पत्रकार राधाकृष्णन ने भी जताई है.

2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम ने एक प्रतिशत से भी कम वोटों के अंतर से 62 सीटों पर जीत हासिल की थी.

कांग्रेस को सिर्फ़ 21 सीटें मिली थीं. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर बढ़कर 35.3 प्रतिशत पहुँच गया, जिसकी बदौलत उसे केरल की 20 सीटों में से 14 सीटें मिलीं.

राधाकृष्णन ध्यान दिलाते हैं कि 26 प्रतिशत वोट पाने वाली सीपीएम और 16.8 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली बीजेपी को सिर्फ़ एक-एक सीट ही मिली थी.

पलक्कड़ के सांसद श्रीकांतन का कहना है, "इस चुनाव का हीरो कांग्रेस पार्टी की 'इंदिरा गारंटी' ही है. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के प्रचार को केरल की जनता ने काफ़ी पसंद किया है. मोदी चाहे कितनी ही बार आएँ, इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा."

हालाँकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के समन्वयक विजय राघवन का कहना है कि राहुल गांधी ने 'इंदिरा गारंटी' के नाम पर जो भी वादे किए हैं, उन्हें पूरा करना संभव ही नहीं है.

वहीं बीजेपी नेता प्रचार कर रहे हैं कि ये सारी योजनाएँ तभी लागू हो सकती हैं, जब बीजेपी सत्ता में आए.

वरिष्ठ पत्रकार राधाकृष्णन कहते हैं, "बीजेपी के लिए यह चुनाव सिर्फ़ अगले क़दम की तैयारी भर है. लेकिन कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए यह चुनाव बेहद अहम है. अगर कांग्रेस हारती है, तो केरल में वह तेज़ी से कमज़ोर पड़ जाएगी. और अगर वाम मोर्चा हारता है, तो वही हाल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का होगा. जो राजनीतिक जगह ख़ाली होगी, उसे तेज़ी से भरने की कोशिश बीजेपी करेगी."

वाम लोकतांत्रिक मोर्चे ने किए हैं 60 वादे

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इमेज कैप्शन, एलडीएफ़ ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में कुल 60 योजनाओं का एलान किया है

पिछले 10 साल से केरल पर शासन कर रहे वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में कुल 60 योजनाओं का एलान किया है. इनमें प्रमुख वादे ये हैः

सामाजिक कल्याण पेंशन बढ़ाकर 3,000 रुपए की जाएगी.

पाँच लाख परिवारों को ग़रीबी से बाहर निकाला जाएगा.

60 हज़ार छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट के अवसर दिए जाएँगे.

एक कौशल विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी.

केएसआरटीसी को मुनाफ़े में लाने के लिए सुधार किए जाएँगे.

इंसान और जंगली जानवरों के बीच होने वाले टकराव को कम करने के उपाय किए जाएँगे.

आशा कार्यकर्ताओं के वेतन में बढ़ोतरी की जाएगी.

कांग्रेस की इंदिरा गारंटी

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी पहले ही 'इंदिरा गारंटी' के नाम से पाँच प्रमुख वादों का एलान कर चुके हैं

कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी पहले ही 'इंदिरा गारंटी' के नाम से पाँच प्रमुख वादों का एलान कर चुके हैं.

इन्हीं वादों की पुष्टि करते हुए, संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे का चुनाव घोषणा पत्र तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने जारी किया.

उसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैः

महिलाओं को केएसआरटीसी बसों में मुफ़्त यात्रा.

कॉलेज छात्राओं को हर महीने 1,000 रुपए की आर्थिक मदद.

सामाजिक कल्याण पेंशन बढ़ाकर 3,000 रुपए करना.

सभी परिवारों को 25 लाख रुपए तक का मुफ़्त 'ओमन चांडी' हेल्थ इंश्योरेंस.

युवाओं को कारोबार शुरू करने के लिए बिना ब्याज पाँच लाख रुपए का क़र्ज़.

वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए अलग विभाग.

धार्मिक आस्थाओं की सुरक्षा के लिए अलग क़ानून.

आशा कार्यकर्ताओं की दिहाड़ी कम से कम 700 रुपए तक बढ़ाई जाएगी.

पुदुचेरी के जिपमर (JIPMER) मॉडल पर बिना शुल्क वाले अस्पतालों की स्थापना.

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इमेज कैप्शन, भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का चुनाव घोषणापत्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने जारी किया

बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का चुनाव घोषणापत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने जारी किया. उसमें शामिल प्रमुख योजनाएँ इस प्रकार हैं-

ग़रीब परिवारों को साल में दो मुफ़्त एलपीजी सिलेंडर.

राज्य में एक एम्स (AIIMS) अस्पताल की स्थापना.

तिरुवनंतपुरम-कन्नूर हाई स्पीड रेल कॉरिडोर का निर्माण.

हर परिवार को 20 हज़ार लीटर मुफ़्त पीने का पानी.

मुल्लापेरियार बांध मुद्दे पर- "तमिलनाडु को पानी, केरल को सुरक्षा."

बीपीएल परिवार की हर महिला के लिए हर महीने 2,500 रुपए का रीचार्ज, जिसे दवा दुकानों और किराना स्टोरों में इस्तेमाल किया जा सकेगा.

सबरीमला, गुरुवायूर सहित सभी पूजा स्थलों की सुरक्षा के लिए देवस्वम बोर्डों का पुनर्गठन.

सबरीमला सोना चोरी मामले में समय सीमा तय कर सीबीआई जाँच.

राज्य के शहरों को अलग-अलग आर्थिक केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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