ईरान युद्ध में मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान का नाम आने से मोदी सरकार पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

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जब से पाकिस्तान का नाम अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के संभावित मेज़बान के तौर पर उभरा है, विपक्षी दलों ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.

इसे विपक्ष ने सरकार की 'कूटनीतिक हार' बताया है.

कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों का कहना है कि भारत मौक़े का फ़ायदा उठाने में 'नाकाम' रहा और पाकिस्तान ने इस मामले में बढ़त बना ली.

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते कुछ दिनों से ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से लगातार संपर्क में हैं और विदेश मंत्री एस जयशंकर भी ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची के संपर्क में हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 24 मार्च को पीएम नरेंद्र मोदी को फ़ोन भी किया लेकिन पाकिस्तान का नाम 'पीस टॉक' में सामने आने को कुछ विशेषज्ञ भारत के लिए झटका मान रहे हैं.

अब तक क्या-क्या हुआ?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मंगलवार शाम एक्स पर पोस्ट किया, "पाकिस्तान मध्य-पूर्व में जारी युद्ध को ख़त्म करने के लिए बातचीत के ज़रिए जारी कोशिशों का पूरा समर्थन करता है, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता स्थापित हो सके."

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शहबाज़ शरीफ़ का यह बयान ट्रुथ सोशल पर भी शेयर किया, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि शायद अमेरिका भी पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत के लिए तैयार है.

दूसरी ओर, ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत के बारे में एक ईरानी राजनयिक ने बीबीसी न्यूज़ उर्दू को बताया कि इस बातचीत की थोड़ी-बहुत संभावना तो है.

अल जज़ीरा ने पाकिस्तान में ईरान के राजदूत के हवाले से कहा, "पाकिस्तान जैसे मित्र देश ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत के लिए ज़रूरी ग्राउंडवर्क कर रहे हैं और उम्मीद है कि इसके अच्छे नतीजे सामने आएंगे."

वहीं मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने भी पाकिस्तान की तारीफ़ करते हुए कहा, "हम पाकिस्तान के अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को होस्ट करने की पहल की पेशकश की तारीफ़ करते हैं. मैं शहबाज़ शरीफ़ और अन्य मित्र देशों के प्रयासों की सराहना करता हूं."

भारत सरकार का पक्ष

भारत की कूटनीति पर उठते सवालों के बीच लोकसभा में बोलते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने मंगलवार, 24 मार्च को कहा "भारत का इस मुद्दे पर स्टैंड बिलकुल साफ़ है. हमने शुरुआत से ही इस लड़ाई पर अपनी चिंता ज़ाहिर की है. मैंने पश्चिम एशिया के सभी नेताओं से बात की और सबसे तनाव कम करने की अपील की. हमने आम लोगों और ट्रांसपोर्ट और एनर्जी फ़ील्ड पर हमलों का विरोध किया है."

पीएम ने मंगलवार को ये जानकारी भी दी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें फ़ोन किया और दोनों ने खाड़ी में चल रहे तनाव के बारे में विचार साझा किए.

पीएम ने कहा कि 'उन्होंने शांति और स्थिरता स्थापित करने पर ज़ोर दिया.'

विपक्ष का क्या कहना है?

इस बीच, मोदी सरकार ने ईरान युद्ध से पैदा हुए हालातों पर चर्चा के लिए 25 मार्च को ऑल पार्टी मीटिंग बुलाई जिसमें विपक्ष ने सरकार से अपनी स्थिति साफ़ करने की मांग की.

बैठक में मौजूद कांग्रेस सांसद तारिक़ अनवर ने बीबीसी संवाददाता चंदन जजवाड़े से बातचीत में कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान के रोल का ज़िक्र करते हुए जो बातें कहीं उनसे हम संतुष्ट नहीं हैं.

पाकिस्तान के संभावित पीस टॉक की मेज़बानी का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 24 मार्च को कहा, "देश की विदेश नीति कॉम्प्रोमाइज़्ड है, क्योंकि पीएम ख़द कॉम्प्रोमाइज़्ड हैं. मोदी सिर्फ़ वही करते हैं जो अमेरिका और इसराइल उनसे करवाना चाहते हैं. मोदी कभी भारत के हित के फ़ैसले नहीं ले सकते और ये साफ़ दिख रहा है."

ईरान युद्ध के शुरू होने के बाद से मोदी सरकार की विदेश नीति का बचाव करने वाले कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी इस बार सरकार को निशाने पर लिया.

उन्होंने कहा, "अगर पाकिस्तान में पीस टॉक होती हैं तो भारत का इससे क्या लेना-देना. लेकिन मैं तीन सप्ताह से कह रहा हूं कि भारत को अमेरिका और ईरान से अच्छे रिश्तों का फ़ायदा उठाकर इस मामले में लीडिंग स्टैंड लेना चाहिए. लेकिन पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र ने ये कर दिखाया. उनको गुड लक, क्योंकि हम सब शांति चाहते हैं. लेकिन भारत को कोई क्रेडिट नहीं मिलेगा, जबकि पाकिस्तान सारा क्रेडिट ले जाएगा."

सामरिक मामलों के जाने-माने विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने डोनाल्ड ट्रंप के पीएम मोदी को फ़ोन करने को 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिश बताया.

उन्होंने कहा, "सच्चाई यही है कि अहम अंतरराष्ट्रीय मामलों में ट्रंप ने पाकिस्तान को चुना. फिर पीएम नरेंद्र मोदी से बात करके डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की ताकि मोदी इसे व्यक्तिगत ना लें. ये एक और मौक़ा है जब ट्रंप ने अपने गुड फ्रेंड मोदी को कमतर आंका."

सरकार का बचाव

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता मानते हैं कि भारत का इस संभावित पीस डील से दूर रहना ही बेहतर है.

वो कहते हैं, "भारत के इसराइल के साथ अच्छे संबंध हैं जबकि पाकिस्तान और ईरान ने तो इसराइल को मान्यता ही नहीं दी है."

शेखर गुप्ता के मुताबिक़ पाकिस्तान भरोसेमंद देश नहीं है.

शेखर गुप्ता के मुताबिक़, "पाकिस्तान अमेरिका और मुस्लिम बहुल ईरान के बीच पीस टॉक कराना चाहता है. वहीं ये एक और मुस्लिम देश अफ़ग़ानिस्तान पर हमले कर रहा है. वहीं ईरान ने अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच भी बातचीत की पेश की थी. ये बड़ी अजीब स्थिति है और भारत को इसमें नहीं पड़ना चाहिए."

इसराइली सरकार के पूर्व प्रवक्ता एलियन लेवी ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "पाकिस्तान के इस मामले में दख़ल से इसराइल सहज नहीं होगा. पाकिस्तान इसराइल के प्रति हमेशा बेहद कड़ा रुख़ अपनाता रहा है. उसने इसराइल को कभी मान्यता तक नहीं दी..."

उन्होंने कहा कि इसके बावजूद अगर ईरान जिन चीज़ों को अब तक नकारता रहा है, उसे मान लेता है तो इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए, हालांकि ऐसा होता नहीं दिखता.

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा, "भौगोलिक रूप से पाकिस्तान को इस मामले में एडवान्टेज है."

लेकिन उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ सुरक्षा समझौता है और सऊदी अरब चाहता है कि अमेरिका ईरान पर हमले बढ़ाए, ताकि खाड़ी क्षेत्र में ईरान की ताक़त कमज़ोर हो और वो सऊदी अरब के लिए ख़तरा ना रह जाए.

सिब्बल कहते हैं कि पाकिस्तान को डर है कि सऊदी अरब उसके साथ किए गए सुरक्षा समझौता को अमल में ना ले आए. जिसके कारण ईरान युद्ध में पाकिस्तान को भी अनचाहे घसीट लिया जाएगा.

सिब्बल इस पूरी प्रक्रिया से भारत के बाहर रहने को अच्छा बताते हुए कहते हैं, "अगर हमने इस मामले में मध्यस्थता की पेशकश कर दी तो हम भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता को लेकर ईरान के लिए दरवाज़े खोल देंगे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.