अमेरिका से सीज़फायर ने ईरान के कट्टरपंथियों को क्यों कर दिया है नाराज़
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- Author, कासरा नाजी
- पदनाम, विशेष संवाददाता, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
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कुछ ही दिन पहले, ईरान की राजधानी तेहरान को नियंत्रित करने वाले इस्लामिक रिपब्लिक के कट्टरपंथी नेताओं ने शहर के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक पर एक विशाल बैनर लगाया था.
उस पर लिखा था, "होर्मुज़ स्ट्रेट बंद रहेगा."
यह संदेश ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा ख़ामेनेई के आदेश का संकेत देने के लिए था, जो पिछले महीने नेता बनाए जाने के बाद से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं.
लेकिन अब, ईरान की ओर से दो हफ़्ते के युद्धविराम और पाकिस्तान के अनुरोध पर होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने पर सहमति देने के बाद, उस बैनर को हटाना पड़ सकता है.
पाकिस्तान इस पूरे मामले में अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहा है.
यह सब इसके बावजूद हुआ, जब ईरान बार-बार कहता रहा था कि वह अस्थायी युद्धविराम के लिए तैयार नहीं है. वह अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ चल रहे युद्ध का स्थायी अंत चाहता है.
कट्टरपंथी गुट इससे खुश नहीं हैं. वे इस बात से और अधिक उत्साहित हो गए थे कि ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया और मिसाइलों और ड्रोन के जरिए खाड़ी देशों में भारी तबाही मचाने की क्षमता दिखाई.
उनका मानना है कि ईरान को युद्ध जारी रखना चाहिए था, क्योंकि अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ उसकी स्थिति मज़बूत थी.
तेहरान से आई रिपोर्टों के मुताबिक़, मंगलवार को युद्धविराम समझौते की घोषणा के बाद उन्होंने सड़कों पर अमेरिकी और इसराइली झंडे जलाए.
कट्टरपंथी युद्धविराम का विरोध क्यों कर रहे हैं
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इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के नियंत्रण वाली बसीज मिलिशिया के कुछ लोग आधी रात को इस फैसले का विरोध करने के लिए विदेश मंत्रालय तक मार्च करते हुए पहुंचे.
कुछ ही घंटों बाद, कट्टरपंथी अख़बार 'कयहान' के संपादक ने लिखा कि युद्धविराम पर सहमत होना "दुश्मन को दिया गया तोहफा" है, जिससे उसे दोबारा ताक़त जुटाने और युद्ध जारी रखने का मौका मिल जाएगा.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और उनके सेना प्रमुख के अनुरोध को स्वीकार करने का फैसला सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (एसएनएससी) ने लिया.
यह ईरान की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, जो सुप्रीम लीडर के अधीन काम करती है और जिसकी अगुआई मध्यमार्गी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान करते हैं.
एसएनएससी ने घोषणा की कि अमेरिका और इसराइल के साथ युद्धविराम के बदले, होर्मुज़ स्ट्रेट से दो हफ़्तों तक सुरक्षित आवाजाही की अनुमति दी जाएगी. जबकि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी रहेगी.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के क़रीबी सहयोगी चीन ने भी पाकिस्तान के इस प्रस्ताव को क़बूल करने के लिए ईरान को मनाने में अहम भूमिका निभाई.
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40 दिनों के युद्ध में ईरान को भारी तबाही झेलनी पड़ी है.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक़, 3,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इससे भी बड़े पैमाने पर मौत और विनाश की धमकी दी थी.
कट्टरपंथी गुटों के बीच भी यह साफ़ होने लगा था कि ईरान के महत्वपूर्ण ढांचे को और नुकसान होने से पहले कोई रास्ता निकालना ज़रूरी है.
युद्धविराम की घोषणा से कुछ घंटे पहले ही कट्टरपंथी मुख्य न्यायाधीश गुलामहुसैन मोहसनी एजई ने ईरानी सरकारी टीवी से कहा था कि ईरान अपनी बढ़त बनाए रखते हुए युद्ध ख़त्म करना चाहता है.
सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने युद्धविराम समझौते को ईरान की जीत के रूप में पेश किया है और शासन के समर्थकों से एकजुट रहने की अपील की है.
ईरानी मीडिया के मुताबिक, ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाग़र ग़ालिबाफ़ इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ बातचीत के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे और सीधे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से बातचीत करेंगे.
यह कट्टरपंथी लाइन से अलग एक और बड़ा बदलाव है. अमेरिका के साथ सीधी बातचीत पर पहले के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने हमेशा प्रतिबंध लगा रखा था. युद्ध की शुरुआत में ही इसराइली हमले में उनकी अपने घर पर मौत हो गई थी.
अब यह सीधा संपर्क उनके बेटे और सुप्रीम लीडर मोजतबा ख़ामेनई की मंजूरी से होता हुआ दिखाई दे रहा है.
युद्धविराम के बावजूद, ईरान और अमेरिका के बीच स्थायी शांति अभी भी दूर है.
अगर बातचीत विफल हो जाती है, तो युद्ध फिर से शुरू हो सकता है. कुछ ईरानी, जो इस युद्ध को एक "खराब शासन" को हटाने का जरिया मानते थे, शायद इसी की उम्मीद भी कर रहे हों.
लेकिन कई अन्य लोगों के लिए, यह युद्धविराम उनके आसपास फैली मौत और तबाही से मिली एक बेहद ज़रूरी राहत है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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