रूसी तेल पर अमेरिका का नया यू टर्न भारत के लिए कैसे है बड़ी राहत की ख़बर

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इमेज कैप्शन, अमेरिका ने दो दिन पहले ही कहा था कि प्रतिबंधित रूसी तेल पर छूट नहीं बढ़ाई जाएगी
    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

अमेरिका ने एक बार फिर यू टर्न लेते हुए रूसी तेल ख़रीदने पर छूट की सीमा को एक महीने के लिए बढ़ा दिया है.

यह फ़ैसला उस समय लिया गया है जब ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा क़ीमतों में तेज़ बढ़ोतरी देखी जा रही थी. इस क़दम को बाज़ार को स्थिर रखने की कोशिश माना जा रहा है.

दो दिन पहले ही अमेरिकी वित्त मंत्री ने रूसी तेल पर दी गई छूट समाप्त करने की घोषणा की थी, लेकिन अब इसे फिर से बढ़ा दिया गया है. इस फ़ैसले को लेकर प्रशासन के रुख़ में बदलाव देखा जा रहा है.

आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ़ ट्रंप का नहीं, बल्कि 'पूरी टीम का यू टर्न' है.

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हालांकि एक दिन पहले ही लेबनान में सीज़फ़ायर का हवाला देते हुए ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को 'पूरी तरह खोलने' का एलान किया था, जिसके बाद कच्चे तेल की क़ीमतें कम हुईं और इस घोषणा के बाद ब्रेंट क्रूड का दाम गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया, जबकि दिन में पहले यह 98 डॉलर से ऊपर था. जंग से पहले यह 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था.

शुक्रवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने एक्स पर जानकारी देते हुए कहा था, "लेबनान में युद्धविराम के बाद सभी व्यावसायिक जहाज़ों के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने का रास्ता युद्धविराम की बाक़ी अवधि तक पूरी तरह खुला घोषित किया जाता है."

हालांकि उसी दिन ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट कर होर्मुज़ स्ट्रेट खोलने के लिए ईरान को धन्यवाद दिया लेकिन एक अन्य पोस्ट में कहा- "होर्मुज़ स्ट्रेट व्यापार और आवाजाही के लिए पूरी तरह खुला और तैयार है, लेकिन नौसैनिक नाकाबंदी ताक़त और प्रभाव के साथ जारी रहेगी."

इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत की संभावना जताई जा रही है. इस वार्ता में मध्यस्थता पाकिस्तान कर रहा है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने कहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के लिए बातचीत जारी है और अब सिर्फ़ कुछ मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है.

तीन देशों के अलावा बाक़ी देशों को छूट

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इमेज कैप्शन, ईरान के होर्मुज़ स्ट्रेट बंद करने से तेल की सप्लाई बाधित हुई है (सांकेतिक तस्वीर)

ट्रंप प्रशासन ने शुक्रवार यानी 17 अप्रैल को कहा कि दुनिया के सभी देशों को (तीन को छोड़कर) प्रतिबंधित रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पाद समुद्र के रास्ते ख़रीदने की अनुमति दी गई है. यह छूट लगभग एक महीने के लिए लागू रहेगी.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने कहा कि शुक्रवार तक जहाज़ों पर लोड किए गए तेल की ख़रीद 16 मई तक की जा सकेगी.

मार्च में ट्रंप प्रशासन ने प्रतिबंधित रूसी तेल ख़रीदने को लेकर एक महीने की छू दी थी, जो 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी.

अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने रूस से संबंधित सामान्य लाइसेंस 134बी जारी किया है.

इसमें कहा गया है, "17 अप्रैल, 2026 तक जहाज़ों पर लदे रूसी संघ मूल के कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की डिलीवरी और बिक्री को अधिकृत किया जाता है."

जनरल लाइसेंस 134बी के अनुसार, इस छूट में वे कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं जिन पर रशियन हार्मफुल फ़ॉरेन सैंक्शन रेगुलेशंस या यूक्रेन-रूसी जंग से जुड़े प्रतिबंध हैं.

हालांकि इसमें ईरान, उत्तर कोरिया और क्यूबा को छूट नहीं दी गई है.

भारत को बड़ी राहत

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इमेज कैप्शन, जानकारों का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन का ताज़ा फ़ैसला भारत के लिए बड़ी राहत है
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वैश्विक तेल बाज़ार पर नज़र रखने वाले जानकारों ने अमेरिकी फ़ैसलों को भारत के लिए राहत बताया है.

अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा, "अमेरिका बयान घरेलू जनता के लिए अधिक होता है क्योंकि तेल के दाम बढ़ेंगे तो उसका राजनीतिक असर हो सकता है."

असल में अमेरिका में इसी साल नवंबर में मिड टर्म चुनाव होने वाले हैं और पोल्स बताते हैं कि अमेरिका में ट्रंप के ईरान जंग को लेकर बहुत कम समर्थन है.

उन्होंने कहा, "हालांकि अमेरिकी प्रशासन का यह फ़ैसला बाकी देशों के लिए है लेकिन इससे भारत को बड़ी राहत मिलेगी. होर्मुज़ स्ट्रेट बाधित होने से अभी भारत को एलपीजी और एलएनजी में ही दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा था लेकिन अगर युद्ध 20 दिन खिंच जाता तो भारत में तेल की क़िल्लत हो सकती थी."

इसकी वजह है कि भारत अपनी कुल ज़रूरतों का लगभग 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है. पारंपरिक रूप से वह खाड़ी देशों से आयात करता रहा है. लेकिन यूक्रेन जंग के बाद उसने भारी मात्रा में रियायती दरों पर रूसी तेल ख़रीदना शुरू किया था.

अमेरिकी टैरिफ़ के चलते इस ख़रीद पर असर पड़ा, और भारत ने खाड़ी के देशों से तेल ख़रीद को बढ़ाया. अब होर्मुज़ स्ट्रेट संकट के चलते इसमें बाधा आ गई है.

लेकिन भारत ने रूस से तेल ख़रीदना कभी बंद नहीं किया और पिछले महीने अमेरिका ने छूट दी तो इसमें फिर से उछाल देखा गया.

नरेंद्र तनेजा ने बताया, "पिछले चार हफ़्तों में भारत की रूसी तेल ख़रीद में ख़ासी बढ़ोतरी आई है. लेकिन दिलचस्प ये है कि जब यूक्रेन जंग शुरू हुआ तो उस समय बाइडन प्रशासन ने भी भारत को बड़े पैमाने पर रूसी तेल ख़रीदने को प्रोत्साहित किया था."

वो कहते हैं, "भारतीय तेल कंपनियों का रूस में समंदर के अंदर साखालिन-1 तेल क्षेत्र में 18 अरब डॉलर का निवेश है. और इस निवेश के लिए भी अमेरिका ने बढ़ावा दिया. और जो कंपनी लेकर गई उसका नाम है एक्सोन मोबिल. यानी ये तेल तो भारत का ही है. असल में जो कहा जाता है और जैसा ज़मीन पर है, उसमें फ़र्क होता है."

अजय श्रीवास्तव दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के प्रमुख हैं. वो रूस के साथ एनर्जी सहयोग को और बढ़ाने की वकालत करते हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "एक महीने की छूट का कोई मतलब नहीं है क्योंकि उसी तेल पर छूट है जो पहले से जहाज़ों पर लदे हैं."

किस देश से कितने दिन में पहुंचता है तेल का जहाज़

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इमेज कैप्शन, होर्मुज़ स्ट्रेट के हालात भी भारत की रूस से तेल ख़रीद को प्रभावित कर सकते हैं

भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि उसने हाल के सालों में तेल आयात में विविधता पर ज़ोर दिया है और अब वो 41 देशों से तेल आयात करता है.

नरेंद्र तनेजा का कहना है कि रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध और होर्मुज़ संकट के कारण भारत को बहुत असर नहीं पड़ा.

लेकिन भारत के संदर्भ में तेल आयात का गणित थोड़ा जटिल है.

वो कहते हैं, "अमेरिका से ट्रेड डील की बात हो रही है और अगर अमेरिका कहता है कि उससे भारत तेल ले तो इसमें कोई दिक़्क़त नहीं है. लेकिन असल बात है कि अमेरिका और ब्राज़ील से भारत तेल पहुंचने में 50 से 60 दिन लगते हैं. जबकि रूस से 28 दिन लगते हैं. खाड़ी देशों से यह समय पांच से सात दिन का है."

उन्होंने बताया कि तीन तरह के जहाज़ों से तेल आता है, एक यूएलसीसी (अल्ट्रा लार्ज कैरियर), वीएलसीसी (वेरी लार्ज कैरियर) और अफ़्रामैक्स. इनकी गति इनके आकार पर निर्भर करती है.

अभी जो अमेरिका छूट दे रहा है वो समंदर में मौजूद तेल टैंकरों के जहाज़ों पर है. यानी जो जहाज़ जंग से पहले चल चुके हैं, उनमें से कई तो अभी भी भी रास्ते में हैं. जंग के दौरान उन जहाज़ों की वजह से तेल आपूर्ति होती रही जो पहले ही चल चुके थे. ये जहाज़ अमेरिका, ब्राज़ील, गुयाना, अंगोला जैसे देशों से आ रहे थे.

हालांकि तेल के दाम में बीतों दिनों काफ़ी उछाल आया. नरेंद्र तनेजा का कहना है, "जंग के दौरान भारत ने 140 डॉलर प्रति बैरल की दर से भी तेल ख़रीदा, जब ट्रेडर्स की स्क्रीन पर दाम 110 डॉलर थे. भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसके पास विदेशी मुद्रा भंडार है और तेल उत्पादक देशों के बीच उसकी साख़ है."

नरेंद्र तनेजा के अनुसार, "जब क़तर से एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति बाधित हुई तो भारत ने तुरंत अर्जेंटीना से सप्लाई करने को कहा जबकि वहां से जहाज़ भारत पहुंचने में 58 दिन लगते हैं. लेकिन अर्जेंटीना बड़े पैमाने पर सप्लाई को राज़ी हो गया क्योंकि वो भारत के साथ अच्छे संबंध चाहता है."

दो गुना बढ़ा रूसी तेल का आयात

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इमेज कैप्शन, अमेरिका की छूट मिलने के बाद भारत ने फिर से रूसी तेल ख़रीद को बढ़ा दिया है

एक यूरोपीय थिंक टैंक के आंकड़ों के मुताबिक़, मार्च में भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात तेज़ी से बढ़ा.

सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) ने एक ताज़ा रिपोर्ट में बताया कि भारत ने मार्च 2026 में मॉस्को से कच्चा तेल ख़रीद दो गुना से ज़्यादा बढ़ाकर 5.8 अरब डॉलर कर दी. जबकि फ़रवरी में ये 1.54 अरब डॉलर थी.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने मार्च 2026 में रूस से 371 मिलियन डॉलर का कोयला और 196 मिलियन डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद भी आयात किए.

मार्च 2022 के बाद से नई दिल्ली रूसी तेल के लिए एक अहम बाज़ार बनकर उभरा है. भारत ने 2024 में रोज़ाना क़रीब 20 लाख बैरल तेल ख़रीदा और पिछले साल मॉस्को से लगभग 44 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया.

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, "भारत में रूस के राजदूत डेनिस एलिपोव ने भरोसा दिलाया है कि रूस भारत को कच्चा तेल, एलपीजी और एलएनजी सहित ऊर्जा निर्यात बढ़ाएगा. अलीपोव के मुताबिक़, रूस ने भारत को तेल की आपूर्ति काफ़ी बढ़ाई है और भारत को जितनी मात्रा में ज़रूरत होगी, उतनी ऊर्जा आपूर्ति जारी रखने के लिए तैयार है. उन्होंने कहा कि भारत एक भरोसेमंद साझेदार रहा है और उसका रुख़ पश्चिमी देशों से अलग स्थिर रहा है."

सस्ते रूसी तेल भारत के लिए बहुत अहम रहा है. इसने तेल वैश्विक अनिश्चितता के दौरान लागत को नियंत्रित करने और आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में मदद की है.

भारतीय रिफ़ाइनर पहले के प्रतिबंधों के अनुसार, खुद को ढाल चुके थे, लेकिन जब पहली बार यह छूट दी गई तो उन्होंने जल्दी ही ख़रीद फिर शुरू कर दी थी.

अब इस छूट को फिर से बढ़ाने से भारत के लगातार अपनाए गए रुख़ को मज़बूती मिलती है, जिसमें बदलते भू-राजनीतिक संकेतों के बीच एनर्जी सिक्योरिटी को प्राथमिकता दी गई है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत को अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए रूस से 20-20 साल का एक लंबा एनर्जी समझौता करना चाहिए और अमेरिका के दबाव को ख़ारिज करना चाहिए."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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