'धुरंधर: द रिवेंज' पर विदेशी मीडिया क्या कह रहा है?

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- Author, यासिर उस्मान
- पदनाम, फ़िल्म इतिहासकार
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
धुरंधर: द रिवेंज (धुरंधर 2) की धमाकेदार कमाई ने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में नई जान फूंक दी है, मगर इसकी गूंज के साथ मतभेदों की आवाज़ भी उतनी ही तेज़ सुनाई दे रही है.
एक तरफ दर्शक इसे ब्लॉकबस्टर का दर्जा दे रहे हैं, तो दूसरी ओर इसकी कहानी, हिंसा और डायलॉग को लेकर राय की जंग भी जारी है. फ़िल्म की चर्चा अब देश की सीमाओं से निकलकर विदेशों तक पहुंच चुकी है, जहां यह शानदार कमाई के नए रिकॉर्ड बना रही है.
लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धुरंधर: द रिवेंज पर क्या लिखा जा रहा है? विदेशी प्रकाशनों और समीक्षकों की प्रतिक्रिया कैसी रही है? आइए एक नज़र डालते हैं.
मशहूर अमेरिकी अख़बार द न्यू यॉर्क टाइम्स में 'धुरंधर: द रिवेंज' की समीक्षा छपी है.
इसमें समीक्षक निकोलस रापोल्ड फ़िल्म की हिंसा पर जमकर निशाना साधते हुए लिखते हैं, "इस अत्यधिक हिंसक और उग्र सीक्वल में रणवीर सिंह एक अंडरकवर भारतीय एजेंट के रूप में लौटते हैं, जो एक तरफ़ राजनीतिक गैंगस्टर , तो दूसरी तरफ़ आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला हत्यारा है."
इस रिव्यू का शीर्षक ही है: 'अ लाइसेंस टू किल, अ लॉट' जिसमें अमेरिकी फ़िल्म समीक्षक निकोलस रापोल्ड ने लिखा है,
"मन को सुन्न कर देने वाली हिंसा हर दृश्य में छाई है, जिसमें ज़िंदा जलाना और प्वाइंट-ब्लैंक पर हत्याएं आम बात हैं, साथ ही परिवारों को मिटाने की धमकियां भी शामिल हैं. संगीत बैकग्राउंड के रूप में इसे और अधिक तीव्र बनाता है, जैसे आप किसी फर्स्ट-पर्सन शूटर गेम की पृष्ठभूमि में हों, जिससे हिंसा और अधिक भयानक और वास्तविक लगती है."
"जहां धुरंधर में रणनीति और घुसपैठ का ड्रामा था, वहीं 'धुरंधर द रिवेंज' महज़ बदले और 'जैसे को तैसा' वाले कत्लेआम की लंबी सिरीज़ जैसी लगती है. हमजा अपनी ताकत बढ़ाता है और भारत में अपने वरिष्ठों से अधिक स्वतंत्रता पाता है. उसका मिशन आतंकवाद विरोधी है, लेकिन उसके छाया युद्ध के रक्तपात में यह खो सा जाता है."
सियासी माहौल की तरफ़ इशारा

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'द न्यूयॉर्क टाइम्स' में धुरंधर 2 की ये समीक्षा वर्तमान भारतीय राजनीति और माहौल की तरफ़ भी इशारा करते हुए कहती है कि दर्शकों को हिंसा के प्रति संवेदनहीन बनाती है: "फिल्म के कैप्शन में भारत पर हुए असली आतंकवादी हमलों का जिक्र होता है, कहानी में 2016 की नोटबंदी को भी शामिल किया गया है, और ज़ोरदार संवादों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बयानों की झलक मिलती है."
"पहले धुरंधर के आलोचक ये सोच सकते हैं कि यह सीक्वल दर्शकों को राष्ट्रीय या धार्मिक आधार पर होने वाली हिंसा के प्रति और अधिक संवेदनाहीन बना देता है. यह फ़िल्म पूरी तरह वर्तमान समय की प्रतिध्वनि है, जो किसी भी तरह से सुकून देने वाली नहीं है."
हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, धुरंधर: द रिवेंज ने (खाड़ी देशों को छोड़कर) किसी भी भारतीय फिल्म के लिए सबसे बड़ी ओपनिंग डे कमाई का रिकॉर्ड बनाया.
उल्लेखनीय है कि किसी भी हिंदी फ़िल्म के लिए यह अब तक की सबसे व्यापक विदेशी रिलीज़ थी, जो लगभग 2,200 सिनेमा हॉल और 3,000 स्क्रीन पर दिखाई गई जिनमें खाड़ी देश शामिल नहीं थे.
विदेशों में इसकी कमाई ने भी भारतीय फ़िल्मों के कई पिछले रिकॉर्ड तोड़े. यानी दर्शकों का प्यार तो मिला लेकिन विदेशी मीडिया की उम्मीद पर ये खरी उतरती नहीं दिख रही है.

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भारी आलोचनाओं के बावजूद, ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका जैसे पश्चिमी बाजारों में 'धुरंधर' और 'धुरंधर: द रिवेंज' की सफलता अप्रत्याशित रही है.
इस कामयाबी पर लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी में क्रिएटिव राइटिंग और कला में समावेशिता की प्रोफेसर, सनी सिंह, कहती हैं, "यह मुझे 1980 के दशक की उन 'हाइपर-मैस्कुलिन' (अति-पौरुष वाली) फ़िल्मों की याद दिलाता है, जिनमें घिनौनी हिंसा और खून-खराबा ही मुख्य आकर्षण हुआ करता था."
"अब वही दौर वापस आ गया है, लेकिन अब इसमें 'अति-राष्ट्रवाद' और जिंगोइज़्म का एक नया तड़का भी लगा दिया गया है. यह पूरा ढांचा गहराई तक पितृसत्तात्मक है, जो भारत और ब्रिटेन सहित पूरी दुनिया में बसे भारतीयों की मानसिकता को लुभाता है."
सनी सिंह लिखती हैं, "यह उन्हें एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में ले जाता है जहां उनके पास दुश्मन पर पूर्ण और निरंकुश अधिकार होता है. वैसे भी, पिछले कई वर्षों से भारत में 'पाकिस्तान' शब्द 'इस्लामोफोबिया' का एक पर्याय बन चुका है. इस नफ़रत को फ़िल्म के कथानक में मिलाएं, इसे धुरंधर की तरह पाकिस्तान में सेट करें, और आपके पास प्रोपेगेंडा का एक परफेक्ट मिश्रण तैयार हो जाता है."
'चार घंटे की नीरस गाथा'

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ऑनलाइन अमेरिकी मीडिया प्रकाशन आईजीएन में फ़िल्म समीक्षक सिद्धांत अदलखा ने भी 'धुरंधर द रिवेंज' की तीखी आलोचना करते हुए इसे 'नग्न राजनीतिक प्रोपेगेंडा' और 'इस्लामोफ़ोबिक' बताया है.
फ़िल्म को 'जासूसी और बदले की चार घंटे की उबाऊ गाथा' बताते हुए वह लिखते हैं, "जब हमजा राजनीतिक कठपुतली की तरह खेलता है, तो एक अजीब विडंबना सामने आती है. केवल अपनी सत्ता बढ़ाने के लिए लगातार प्रतिद्वंद्वी गिरोहों और जातीय समूहों को नफ़रत का बहाना देने का उसका खेल, फ़िल्म की खुद की मशीनरी यानी हिंदुत्व प्रोपेगेंडा का अनजाने में प्रतिबिंब बन जाता है.
"द रिवेंज इतनी बेझिझक इस्लामोफोबिया में डूबी है कि यह देख ही नहीं पाती कि धीरे-धीरे यह अपनी ही आलोचना का प्रतीक बन जाती है."
आईजीएन की ये समीक्षा फ़िल्म के तकनीकी पक्ष पर भी निशाना साधती है, "द रिवेंज बिलकुल आखिरी समय में पूरी हुई, और यह हर दृश्य में साफ दिखता है. एक बड़ी और महंगी स्टूडियो प्रोडक्शन के लिए यह स्वीकार्य नहीं कि एक घंटे लंबे एक्शन क्लाइमेक्स में सीन्स और साउंड डिज़ाइन बिखरा-बिखरा लगे. लेकिन फिर, जब आप पहले से तैयार दर्शकों को संबोधित कर रहे हों, तब असली कला का कोई खास मतलब नहीं रह जाता. जरूरी है तो केवल नफरत की आग भड़काना और लोगों को वही सुनाना जो वे सुनना चाहते हैं."
"शायद निर्माताओं में एक मुकम्मल फ़िल्म पेश करने की शिष्टता दिखानी चाहिए थी, लेकिन जब 'धुरंधर: द रिवेंज' का मुख्य उद्देश्य ही एक संवेदनशील मतदाता वर्ग को उकसाना हो, तो शराफत की उम्मीद करना बेमानी है."
खाड़ी देशों में क्या प्रतिक्रिया?

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हालांकि धुरंधर 2 सऊदी अरब, क़तर, क़ुवैत, ओमान और बहरीन जैसे गल्फ़ देशों में रिलीज़ नहीं हुई लेकिन यूएई के प्रतिष्ठित गल्फ न्यूज़ में इसकी समीक्षा छपी है.
इसमें पत्रकार मंजुशा राधाकृष्णन लिखती हैं, "कहानी के ट्विस्ट, जिनमें भारत में नोटबंदी जैसी वास्तविक घटनाओं को आतंकवाद की फंडिंग रोकने की रणनीति से जोड़ने की कोशिश की गई है, काफी बनावटी लगते हैं."
"कई बार फ़िल्म सीधे प्रधानमंत्री को 'ट्रिब्यूट' जैसी लगती है, जहां संवाद गंभीरता को कम करते हुए लगते है जैसे पाकिस्तानी आतंकी एक 'चायवाले पीएम' को अपनी बर्बादी का जिम्मेदार बताता है. ऐसे पल बारीकियों को नज़रअंदाज़ और पूरी कहानी के प्रभाव को कम कर देते हैं."
फ़िल्मों से जुड़े अमेरिकी ऑनलाइन पोर्टल 'मूवीज़ वी टेक्स्टेड अबाउट' के लिए अपनी समीक्षा में सारा मैनवेल ने इस पूरे अनुभव को 'सोशियोपैथिक' (समाज-विरोधी मानसिक विकृति) करार दिया है.
वह लिखती हैं: "फिल्म में क्रूरता और खून-खराबा इतना गंभीर है कि एक स्पष्ट रूप से नस्लवादी सीक्वेंस में बोनी एम. के 'रासपुतिन' गाने का इस्तेमाल भी मज़ेदार नहीं लगता. यह पूरा अनुभव मानसिक रूप से विचलित करने वाला और सोशियोपैथिक है."
वहीं 'कल्चर मिक्स' की कार्ला हे अपनी समीक्षा में सिर्फ़ विकास नौलखा की शानदार सिनेमैटोग्राफी की तारीफ़ करती है.
लेकिन फिल्म की हिंसा और 'नफ़रत भरे संवादों' की तीखी आलोचना करते हुए कार्ला लिखती हैं, "यह फिल्म सिर्फ़ वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं का एक काल्पनिक, कट्टर और अत्यधिक हिंसक संस्करण दिखाने का बहाना है. धुरंधर: द रिवेंज खुद को देशभक्ति वाली फिल्म दिखाने की कोशिश करती है, लेकिन यहां दिखाया गया ज़हरीला और क्रूर राष्ट्रवाद प्रेरक नहीं, बल्कि विषैला है."
क्या धुरंधर को महज़ एक व्यवसायिक स्पाई थ्रिलर के रूप में नहीं देखा जा सकता जिसका उद्देश्य मनोरंजन और कमाई है?
इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर सनी सिंह का मानना है, "यक़ीनन धुरंधर तकनीकी रूप से सशक्त एक्शन फ़िल्म है. लेकिन यह हॉलीवुड की उन तमाम तकनीकों का भी इस्तेमाल करती है, जो होमलैंड, जेम्स बॉन्ड और मिशन इम्पॉसिबल जैसी फ़िल्मों में दिखती हैं. वही 'हाइपर-माचो' (अति-मर्दानगी), सैन्यवादी सोच और उग्र राष्ट्रवादी हिंसा. इयान फ्लेमिंग ने 'जेम्स बॉन्ड' के किरदार की रचना ही ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की प्रतिक्रिया के रूप में की थी, ताकि इस प्रोपेगेंडा के जरिए ब्रिटिश राष्ट्रवाद को संतुष्ट किया जा सके."
सनी सिंह के अनुसार, "दरअसल मसाला थ्रिलर्स के नाम पर इसी तरह की फ़िल्में धीरे-धीरे नफ़रत को बढ़ाने का काम करती हैं. समस्या यह है कि कश्मीर फाइल्स ने सीमाएं धकेलीं, फिर धुरंधर आई, और अब धुरंधर 2 उस प्रोपेगेंडा की सीमा को और आगे बढ़ा रही है, जो हर नई फ़िल्म के साथ और अधिक सामान्य और स्वीकार्य बनता जा रहा है."

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पिछली फ़िल्म (धुरंधर) की बॉक्स ऑफिस कमाई और दर्शकों के उन्माद को देखते हुए देश-विदेश में धुरंधर 2 (द रिवेंज) की व्यवसायिक कामयाबी तो तक़रीबन तय ही थी.
लेकिन ख़ासतौर पर पश्चिम से आ रही ये समीक्षाएं और प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि वाहवाही औऱ बेतहाशा कमाई के बावजूद, 'धुरंधर द रिवेंज' मनोरंजन और प्रोपेगेंडा के बीच की उस धुंधली होती लकीर पर कई गहरे और परेशान करने वाले सवाल तो छोड़ ही रही है,
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































