इसराइल की 'हिट लिस्ट' में रहे ग़ालिबाफ़, अब अमेरिका से बातचीत की कर सकते हैं अगुवाई

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- Author, पॉरिया महरूयान
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ पर्शियन
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ अब एक बहुत ही अहम भूमिका निभा रहे हैं. ख़बरों के मुताबिक़, उन्हें ईरान युद्ध में अमेरिका के साथ बातचीत का काम सौंपा गया है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक पाकिस्तानी सूत्र के हवाले से बताया कि विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची के साथ-साथ ग़ालिबाफ़ का नाम भी इसराइल की 'हिट लिस्ट' से हटा दिया गया था.
इस सूत्र ने बताया, "इसराइलियों के पास उनके ठिकाने की जानकारी थी और वे उन्हें मारना चाहते थे. हमने अमेरिका से कहा कि अगर इन्हें भी मार दिया गया, तो फिर बातचीत करने के लिए कोई बचेगा ही नहीं. इसलिए, अमेरिका ने इसराइल से पीछे हटने को कहा."
ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले देशों में पाकिस्तान भी है.
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अमेरिकी मीडिया आउटलेट 'पॉलिटिको' के अनुसार, 64 साल ग़ालिबाफ़ ने भले ही दुश्मनों को चेतावनी दी हो कि वे "अपनी ज़मीन की रक्षा करने के हमारे इरादे" को परखने की कोशिश न करें.
उन्होंने एक्स पर "लगातार हमले" करने की धमकी भी दी है, फिर भी कुछ अमेरिकी अधिकारी उन्हें एक ऐसे सहयोगी के तौर पर देखते हैं जिनके साथ मिलकर काम किया जा सकता है.
ग़ालिबाफ़ ने ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए कई प्रयास किए हैं.
मौजूदा जंग में अमेरिका और इसराइल के हमलों में ईरान के कई वरिष्ठ नेता मारे जा चुके हैं.
ऐसे में एलीट इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के साथ उनके क़रीबी संबंध, सरकार की विभिन्न विभागों में उनका अनुभव और कट्टरपंथी लेकिन एक 'व्यावहारिक' व्यक्ति के तौर पर उनकी छवि उन्हें सत्ता के एक नए स्तर तक पहुंचा सकती है.
ग़ालीबाफ़ का इस्लामी क्रांति से संबंध

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ईरानी सरकारी ब्रॉडकास्टर आईआरआईबी के स्वामित्व वाले अरबी भाषा के टीवी चैनल 'अल-आलम' के मुताबिक़ ग़ालिबाफ़ का जन्म ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर तोरग़बेह में एक धार्मिक, मज़दूर-वर्ग के परिवार में हुआ था.
उनका गृह नगर मशहद के क़रीब है, जहाँ से इस्लामी क्रांति की कुछ प्रमुख हस्तियों का नाता रहा है.
16 साल की उम्र में, उन्होंने मशहद की प्रमुख मस्जिदों में क्रांतिकारी धर्मगुरुओं, जिनमें उस समय के भविष्य के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई भी शामिल थे, से शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी.
साल 1979 की इस्लामी क्रांति के तुरंत बाद, ग़ालिबाफ़ ने इराक़ के साथ युद्ध में हिस्सा लिया और 20 साल की उम्र में आईआरजीसी में शामिल हो गए. दो साल बाद, वे इसकी एक जंगी डिवीज़न के कमांडर बन गए. वह साल 1988 में इराक़ युद्ध समाप्त होने तक इस पद बने रहे.
अल-आलम के अनुसार, ग़ालिबाफ़ ने उसी साल शादी की जिस साल वे आईआरजीसी के कमांडर बने थे. उनकी शादी की रस्में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रोहिल्ला ख़ुमैनी ने पूरी करवाई थीं. ग़ालिबाफ़ की तीन संतान भी हैं.
इराक़ युद्ध के बाद भी ग़ालिबाफ़ का ओहदा बढ़ता रहा और साल 1997 में वे आईआरजीसी के वायु सेना के कमांडर बन गए.
छात्रों के दमन में भूमिका

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जुलाई 1999 में ईरान छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से हिल गया था. इन प्रदर्शनों की शुरुआत एक सुधारवादी अख़बार के बंद होने से हुई थी.
इस आंदोलन को बड़ी बेरहमी से दबा दिया गया, जिसमें कई लोगों की जान चली गई. माना जाता है कि इस दमनकारी कार्रवाई में ग़ालिबाफ़ ख़ुद भी शामिल थे.
एक लीक हुई ऑडियो फ़ाइल में उन्हें यह कहते हुए सुना गया, "मेरी एक तस्वीर है जिसमें मैं एक हज़ार सीसी की मोटरसाइकिल पर सवार हूँ और मेरे हाथ में एक लाठी है. जहाँ भी सड़कों पर उतरने और लाठियों का इस्तेमाल करने की ज़रूरत होती है, हम उन लोगों में से हैं जो ऐसा करते हैं. हमें इस बात पर गर्व भी है."
विरोध प्रदर्शनों के बाद आईआरजीसी के 24 कमांडरों ने उस समय के राष्ट्रपति और एक सुधारवादी नेता मोहम्मद ख़ातमी को एक बेहद सख़्त भाषा में पत्र लिखा.
इस पत्र में आईआरजीसी ने दख़ल देने की धमकी दी थी. ग़ालिबाफ़ ने बताया कि वे उन दो कमांडरों में से एक थे जिन्होंने इस पत्र का मसौदा तैयार किया था और उस पर अन्य लोगों के हस्ताक्षर लिए थे.
कई लोग इस पत्र को राजनीतिक मामलों में आईआरजीसी के बढ़ते दबदबे की एक स्पष्ट घोषणा के तौर पर देखते हैं और तब से यह दबदबा लगातार बढ़ता ही गया है.
पुलिस प्रमुख से तेहरान के मेयर तक

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छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के एक साल बाद, ग़ालिबाफ़ को 39 साल की उम्र में पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया.
अपने पाँच साल के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने एक राष्ट्रीय आपातकालीन पुलिस हॉटलाइन शुरू की और पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को आसान बनाया.
उन्होंने पुलिस बल को विदेशी गाड़ियों से लैस करने को अपनी सबसे गौरवपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस पर काफ़ी पैसे ख़र्च किए गए.
साल 2005 में ग़ालिबाफ़ ने पुलिस प्रमुख के पद से इस्तीफ़ा दे दिया और राष्ट्रपति चुनाव लड़ा. चुनाव हारने के बाद उन्हें तेहरान का मेयर चुन लिया.
वह 12 साल तक इस पद पर रहे और राजधानी के मेयर के तौर पर सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड अभी भी उन्हीं के नाम है.
ट्रैफ़िक की समस्या से जूझ रही राजधानी में मेट्रो व्यवस्था का विस्तार करने और सदर एक्सप्रेसवे जैसे बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है.

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साल 2016 के "एस्ट्रोनॉमिकल प्रॉपर्टीज़" घोटाले के बाद ग़ालिबाफ़ की साख़ को धक्का लगा. इस मामले में सिटी काउंसिल पर अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों को सैकड़ों प्रॉपर्टीज़ भारी छूट पर बेचने का आरोप लगा था. यह छूट बाज़ार कीमत से 50% तक ज़्यादा थी.
ग़ालिबाफ़ के पद छोड़ने से कुछ महीने पहले ईरान की सबसे शुरुआती ऊंची इमारतों में से एक,17-मंज़िला प्लास्को बिल्डिंग आग लगने के बाद ढह गई.
इस हादसे में कम से कम 20 दमकलकर्मियों की मौत हो गई. इस हादसे ने ग़ालिबाफ़ के नेतृत्व में शहर के प्रशासन में मौजूद सिस्टम की लापरवाही को उजागर किया.
फिर भी इन दोनों में से किसी भी घोटाले के कारण ग़ालिबाफ़ को न तो पद से हटाया गया और न ही उन पर महाभियोग चलाया गया. वे दोनों ही मामलों से बच निकले.
साल 2020 में उन्होंने ईरान में संसदीय चुनाव में एक सीट जीती और स्पीकर बन गए.
राष्ट्रपति पद के असफल प्रयास और स्पीकर पद

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ग़ालिबाफ़ की नज़र हमेशा से ही राष्ट्रपति पद पर रही है, लेकिन साल 2005, 2013, 2017 और 2024 में उनके चारों प्रयास नाकाम रहे.
अपने पहले प्रयास में आईआरजीसी के इस अनुभवी सैनिक ने अपनी सैन्य पृष्ठभूमि पर ज़ोर दिया, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए राजनीतिक भूगोल में पीएचडी धारक और एक प्रशिक्षित पायलट के तौर पर अपनी योग्यताओं को प्रचारित किया.
उन्होंने ख़ुद को एक "जिहादी मैनेजर" के रूप में भी पेश किया है, और अपनी सैन्य क्षमता के साथ ही अपने समर्पण का बखान किया.
भले ही ग़ालिबाफ़ को लंबे समय से सुधारवादियों का विरोधी माना जाता रहा है, लेकिन हाल के सालों में ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि रूढ़िवादी खेमे के कुछ हिस्सों से उनके मतभेद पैदा हो गए हैं.
साल 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में, कट्टर रूढ़िवादियों के एक बड़े समूह ने उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया और उन्हें चुनाव की दौड़ से हटने के लिए मनाने की कोशिश की.
साल 2022 में ग़ालिबाफ़ एक बार फिर भ्रष्टाचार के एक कथित घोटाले में फंस गए. तुर्की की यात्रा से लौटने के बाद एयरपोर्ट पर उनके परिवार की कुछ तस्वीरें सामने आईं, जिनमें वे एक स्ट्रोलर समेत बच्चों का बहुत सारा सामान ले जाते हुए दिख रहे थे. इन तस्वीरों से लोगों में भारी गुस्सा फैल गया.
उनके आलोचकों ने उन पर "पाखंड, दोहरेपन और दिखावटी धार्मिकता" का आरोप लगाया, लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि यह मामला राजनीति से प्रेरित है और उन्हें ईरानी राजनीति से हटाने की एक साज़िश है.
ग़ालिबाफ़ पर इस मामले का कोई असर नहीं पड़ा और साल 2024 में वे फिर से स्पीकर चुन लिए गए.
अब जब ईरान एक अहम मोड़ पर खड़ा है, तो उनकी राजनीतिक क़िस्मत और भी चमक सकती है.
इसकी वजह है युद्ध को जारी रखने की देखरेख करने और सेना के वरिष्ठ कमांडरों और सत्ता की तीनों शाखाओं के प्रमुखों के बीच तालमेल बिठाने की उनकी क़ाबिलियत.
संपादन: ग्रेस त्सोई
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































