You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बजट 2026 में युवा और महिलाओं के लिए क्या है ख़ास?
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को संसद में आम बजट पेश किया. वित्त मंत्री के तौर पर ये उनका नौवां बजट था. तक़रीबन डेढ़ घंटे तक चले बजट अभिभाषण में वित्त मंत्री ने अलग-अलग सेक्टर्स को लेकर कई घोषणाएं की हैं.
विपक्ष ने इसे आम लोगों, ख़ासकर मिडिल और लोअर मिडिल क्लास के लिए निराशाजनक बताया, तो वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बजट को विकसित भारत की ऊंची उड़ान का मज़बूत आधार बताया.
दूसरी ओर इंडस्ट्री और कॉरपोरेट जगत ने हेल्थकेयर, सेमीकंडक्टर, टेक्नोलॉजी और एमएसएमई पर फोकस की सराहना की है. कुछ राज्यों ने आरोप लगाया है कि बजट में उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है.
बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें
लेकिन इस बजट को अर्थशास्त्री कैसे देख रहे हैं? बजट में भारत के सबसे बड़े वर्ग यानी युवा और महिलाओं के लिए क्या है?
ये समझने के लिए हमने दो अर्थशास्त्रियों से बात की. ये विश्लेषण उसी बातचीत के आधार पर लिखा गया है.
क्या कह रहे हैं अर्थशास्त्री?
अर्थशास्त्री मिताली निकोर कहती हैं कि इस बजट में उन्हें ऐसा कोई फ़ैक्टर नज़र नहीं आया जो आपको आश्चर्यचकित करे, या फिर यादगार रह जाए.
वह कहती हैं, ''जैसे पिछले बजट में 12 लाख तक कोई टैक्स नहीं होगा, ये घोषणा अभी भी लोगों की याद में है. इस बार ऐसी कोई अनाउंसमेंट नहीं हुई. लेकिन जो हुईं उसे देखते हए इस बजट को लॉन्ग टर्म बजट के रूप में देखा जा सकता है. जिसका असर हमें अगले पांच-दस सालों में नज़र आएगा, अभी नहीं.''
वहीं अर्थशास्त्री और जेएनयू के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का कहना है कि सरकार इतनी बड़ी -बड़ी घोषणाएं कर तो देती है, लेकिन उन पर कितने पैसे ख़र्च हुए, कितने होने हैं, कितने दिनों में होने हैं...ये सारी जानकारियां नहीं बताती.
उनका कहना है, ''जैसे मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई पीएलआई स्कीम (प्रोडक्शन लिंक्ड स्कीम) में छह साल में 1.76 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही गई थी, लेकिन चार साल बाद भी इसका सिर्फ 10 से 12% ही खर्च हुआ है. घोषणा के वक्त यह एक बहुत बड़ा कार्यक्रम लगा था, मगर ज़मीन पर असर सीमित रहा.''
''यही स्थिति स्किल डेवलपमेंट जैसी योजनाओं की भी है, जहां कुछ लोगों को ट्रेनिंग तो मिली, लेकिन उन्हें स्थायी रोज़गार नहीं मिला. ऐसे में योजनाएं अपने मकसद तक नहीं पहुंच पातीं.''
पर इसके बावजूद सरकार का दावा है कि इस बार का बजट यूथ केंद्रित है.
'यूथ केंद्रित बजट'
भारत में करीब 65% से ज़्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है, यानी हमारा देश एक युवा देश हैं. लेकिन महंगी होती शिक्षा, बेरोज़गारी, ये कुछ चुनौतियां हैं जो इस वर्ग के भविष्य के आड़े आती हैं.
ऐसे में इस बजट में क्या ऐसी कोई ठोस घोषणा या योजना की बात की गई है, जिससे इन्हें राहत महसूस हो?
इस सवाल पर मिताली निकोरे जवाब देती हैं, ''युवाओं के लिहाज़ से बजट में एआई पर दिया गया ज़ोर एक सकारात्मक संकेत है. एआई को डर के तौर पर नहीं, बल्कि युवाओं की प्रोडक्टिविटी और एम्प्लॉयबिलिटी यानी नौकरी बढ़ाने के टूल के रूप में देखा गया है.
"दस हज़ार करोड़ का एमएमएमई ( सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) फंड भी युवाओं के लिए एक अहम घोषणा है. ख़ासकर उन युवाओं के लिए जो स्टार्टअप या सेकेंड-जनरेशन उद्यमी के तौर पर अपने बिज़नेस को आगे बढ़ाना और स्केल-अप करना चाहते हैं. खेलो इंडिया मिशन को भी रोज़गार और स्वास्थ्य दोनों के नज़रिए से युवाओं के लिए एक अवसर के तौर पर देखा जा सकता है. "
"वहीं ऑरेंज इकोनॉमी के ज़रिए कंटेंट क्रिएशन को पहचान दी गई है. टियर-2, टियर-3 शहरों के युवा पहले से ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और बजट ने इस गतिविधि को हाइपर-लोकल मार्केटिंग और रोज़गार से जोड़ने की दिशा दिखाई है.''
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का मानना है कि रोज़गार को लेकर कोई ख़ास घोषणा नहीं की गई है, जबकि युवाओं का सबसे बड़ा मुद्दा रोज़गार ही है.
वह कहते हैं, ''अगर अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ानी है, तो उसके लिए सबसे ज़रूरी है रोज़गार बढ़ाना. इसके लिए बजट में ऐसे प्रावधान होने चाहिए जो सीधे तौर पर रोज़गार सृजन करें. रोज़गार पैदा करने वाले सेक्टर साफ हैं - ग्रामीण क्षेत्र, शिक्षा और स्वास्थ्य. लेकिन बजट में अक्सर इन्हीं क्षेत्रों में कटौती दिखाई देती है. इसके उलट, पूंजी-प्रधान यानी कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर्स के लिए आवंटन बढ़ा दिया जाता है. सड़क, हाईवे या फ्रेट कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स में ख़र्च बढ़ाने से निवेश का आंकड़ा तो बड़ा दिखता है, लेकिन ये क्षेत्र अब काफ़ी हद तक मशीनों पर निर्भर हैं और इनमें सीमित रोज़गार ही पैदा होता है."
"इसलिए अगर सरकार सच में रोज़गार बढ़ाना चाहती है, तो उसे अपनी नीतियों और बजट की प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचना होगा. जिन क्षेत्रों से ज़्यादा नौकरियां बनती हैं, उनमें खर्च बढ़ाए बिना न तो मांग बढ़ेगी और न ही रोज़गार.''
महिलाओं के लिए बजट में क्या?
पिछले विधानसभा चुनावों के प्रचार से लेकर नतीजों में ये बात सामने आई है कि महिलाएं एक बड़े वोट बैंक के रूप में उभरी हैं. प्रचार के दौरान लगभग हर पार्टी ने उनके लिए विशेष कैश ट्रांसफर योजनाओं की घोषणा की.
ऐसे में सवाल ये भी है कि विधानसभा प्रचार में एक वोट बैंक की तरह दिखने वाली महिलाओं को केंद्र सरकार ने इस साल के बजट में क्या कुछ दिया है?
बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महिलाओं की शिक्षा, रोज़गार, उद्यमिता और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कुछ अहम घोषणाएं की हैं.
जैसे, महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देने की बात कही गई है. स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को सस्ता लोन, बेहतर क्रेडिट सुविधा और बाज़ार तक पहुंच देने पर ज़ोर दिया गया है. बजट में घोषणा की गई है कि महिलाओं को अपना सामान बेचने के लिए एक अलग प्लैटफॉर्म उपलब्ध कराया जाएगा.
इसके लिए सरकार शी-मार्ट खोलने का प्रबंध करेगी. ये रिटेल आउटलेट्स क्लस्टर लेवल फेडरेशन्स के तहत चलाए जाएंगे, यानी इन्हें किसी एक व्यक्ति नहीं बल्कि समुदाय मिलकर संचालित करेगा.
इन दुकानों का मालिकाना हक़ भी समुदाय के पास होगा और मुनाफ़ा भी उन्हीं लोगों तक पहुंचेगा.
हर ज़िले में एक वुमन हॉस्टल बनाने की घोषणा की गई है. इसके अलावा, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए स्किल डेवलपमेंट और ट्रेनिंग प्रोग्राम को भी विस्तार देने की बात कही गई है, ताकि वे बदलते जॉब मार्केट के हिसाब से खुद को तैयार कर सकें.
अर्थशास्त्री मिताली निकोर कहती हैं, ''ख़ासकर जब महिलाएं पढ़ाई, ट्रेनिंग या काम के लिए अपने गांव या शहर से बाहर जाती हैं, तो उन्हें घर मिलना सबसे बड़ी चुनौती होती है. महिलाओं की लेबर फ़ोर्स में भागीदारी बढ़ाने के लिए सिर्फ़ नौकरी होना काफी नहीं होता. इसके लिए स्किल ट्रेनिंग, चाइल्ड केयर और एल्डट केयर जैसी सुविधाएं, और सबसे ज़रूरी सुरक्षित व सस्ती रहने की व्यवस्था भी चाहिए."
"बजट में हर ज़िले में कम से कम एक महिला हॉस्टल बनाने की बात कही गई है. इसका फायदा यह होगा कि पढ़ाई, स्किल ट्रेनिंग या नौकरी के लिए आने वाली महिलाएं इन हॉस्टलों का इस्तेमाल कर सकेंगी. यह महिलाओं की रोजगार भागीदारी बढ़ाने के लिए मददगार साबित होगा.''
मिताली निकोर कहती हैं कि शी-मार्ट का विचार अच्छा है पर उसे धरातल पर उतार पाना थोड़ा मुश्किल है.
उन्होंने बताया, "दरअसल, महिला स्वयं सहायता समूह पहले से ही मजबूत हैं और देश में लाखों वुमन-लेड एसएचजी काम कर रही हैं. अब सबसे बड़ी चुनौती है उन्हें सही मार्केट एक्सेस देने की. अगर शी-मार्ट बनाए जाते हैं, तो उन्हें मौजूदा बाजारों और उपभोग केंद्रों के बीचो-बीच होना चाहिए, ताकि महिलाओं के बनाए उत्पाद सीधे ग्राहकों तक पहुंच सकें.''
वेलफ़ेयर स्कीमों में कटौती
इसा बार के बजट में कुछ वेलफ़ेयर स्कीमों में कटौती दिखाई दी. जैसे - जल जीवन मिशन में करीब 5 फीसदी और प्रधानमंत्री आवास योजना में लगभग 10 फ़ीसदी की कमी की गई है.
इसके उलट, इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में इस बार बड़े इज़ाफे़ देखने को मिले हैं.
इस पर मिताली निकोरे कहती हैं, ''यह रुख इसलिए भी अपेक्षित था, क्योंकि सरकार ने इस बजट में आर्थिक सुरक्षा को एक बड़ा मुद्दा बताया है. इसके लिए डिफेंस, रिन्यूएबल एनर्जी और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर ज़ोर दिया गया है.
इसी सोच के तहत रेयर अर्थ कॉरिडोर, सेमीकंडक्टर मिशन, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और टेक्सटाइल पार्क्स जैसे नए मिशनों के लिए अतिरिक्त आवंटन किए गए हैं. लेकिन ये संसाधन कहीं से तो आएंगे, इसलिए उसका असर आवास और जल जैसी योजनाओं पर पड़ा है.''
लेकिन प्रोफ़ेसर अरुण का कहना है, ''कृषि देश का सबसे बड़ा क्षेत्र है, जहां करीब 46 फीसदी लोग काम करते हैं, लेकिन बजट में इसे उतनी प्राथमिकता नहीं मिली. कृषि और ग्रामीण विकास के लिए तय राशि इस साल पूरी खर्च नहीं हुई और अगले साल के लिए भी कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गई. ''
''आवास, पेयजल और सड़क जैसी योजनाओं में कटौती से साफ है कि कृषि को जितना समर्थन चाहिए था, वह नहीं मिला. छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए जरूरी तकनीक और निवेश पर भी बजट में ज़ोर नहीं दिखता.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित