अमेरिका-ईरान युद्धविराम का क्रेडिट पाकिस्तान को मिलना क्या भारत के लिए झटका है?
इमेज स्रोत, Sonu Mehta/Hindustan Times via Getty Images
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल जंग में दो हफ़्ते के युद्धविराम का भारत ने स्वागत किया है.
लेकिन उसने पाकिस्तान का नाम लेने या उसके प्रयासों का ज़िक्र करने से परहेज किया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, "हम युद्धविराम के फ़ैसले का स्वागत करते हैं. हमें उम्मीद है कि इससे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी. जैसा कि हम पहले भी कहते रहे हैं कि मौजूदा जंग को समाप्त करने के लिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीति ज़रूरी है."
विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि जंग ने पहले ही काफ़ी तबाही मचा दी है, "इसने वैश्विक तेल और ऊर्जा सप्लाई और व्यापार प्रणाली को बाधित कर दिया है. हम आशा करते हैं कि कमर्शियल और तेल के जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़र सकेंगे."
ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत, जहाँ एक ओर दुनिया भर से कई नेता पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, वहीं भारत के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत को लेकर भी चुप्पी साधे रखी.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
पाकिस्तान की प्रशंसा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस युद्धविराम के लिए पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना हो रही है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम की घोषणा करते हुए पाकिस्तान का ज़िक्र किया.
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने यह निर्णय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ और सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अनुरोध पर लिया है.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना की.
उन्होंने अपने बयान में कहा, "ईरान की ओर से, मैं अपने मित्र देश पाकिस्तान, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के प्रति क्षेत्र में जंग ख़त्म करने के लिए, उनके अथक प्रयासों की तारीफ़ करता हूँ."
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने संघर्ष को कम करने में पाकिस्तान सहित मध्यस्थों की भूमिका की भी सराहना की .
उन्होंने लिखा, "हम तनाव कम करने के प्रयासों के लिए पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब सहित सभी वार्ताकारों के प्रयासों का आभार व्यक्त करते हैं और उनका समर्थन करते हैं."
यूरोपीय यूनियन कमिशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेन ने मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को धन्यवाद दिया है.
विदेश नीति पर सवाल
इमेज स्रोत, Roy Rochlin/Getty Images for Newsweek
विपक्षी पार्टियों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान के 'बढ़ते क़द' को लेकर भारतीय विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं.
विपक्षी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने युद्धविराम पर अपनी पार्टी की प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "पाकिस्तान ने जो किया है, वही भारत को करना चाहिए था. लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल को 'फ़ादरलैंड' कहते हैं, तो वे युद्धविराम की चर्चा कैसे कर सकते हैं?"
प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने पीएम मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, "पाकिस्तान ने जो भूमिका निभाई और सीज़फायर करवाया, उससे मोदी जी की पर्सनल स्टाइल वाली डिप्लोमेसी को बड़ा झटका लगा है."
"28 फ़रवरी ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था. ये घटनाएँ प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं. इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया."
उन्होंने लिखा, "विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था. लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है."
कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा, "बीजेपी सरकार की ग़लतियों के कारण पाकिस्तान को युद्धरत पक्षों के बीच मध्यस्थता में भूमिका निभाने का मौका मिला, जबकि भारत एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में बेहतर स्थिति में था."
लेकिन शिवसेना-यूबीटी की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, "भारत को अमेरिका और ईरान के बीच किसी बातचीत की मेज़ पर क्यों होना चाहिए था? आलोचना समझ नहीं आती, क्योंकि यह हमारी लड़ाई नहीं थी. पाकिस्तान के लिए यह ऐसा है जैसे कोई कछुआ जो पैसे लेकर कहे कि वह संकट सुलझा देगा, जैसा कि भारत के विदेश मंत्री ने सर्वदलीय बैठक में अच्छे तरीके से बताया."
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने एक्स पर लिखा, "युद्धविराम से होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खुल गया, वही होर्मुज़ स्ट्रेट जो युद्ध शुरू होने से पहले सबके लिए खुला और आसानी से इस्तेमाल करने लायक था. तो आखिर इस 39 दिन के युद्ध से अमेरिका ने क्या हासिल किया?"
पाकिस्तानः मध्यस्थ या संदेश वाहक?
इमेज स्रोत, whitehouse
ईरान जंग में पाकिस्तान को क्या डिप्लोमेसी में भारत की तुलना में बढ़त मिली है?
इसे लेकर विपक्षी दलों में तो आम राय है लेकिन विश्लेषकों और पत्रकारों की राय मिली-जुली है.
अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत इसे 'शार्ट टर्म कूटनीति' कहते हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से उन्होंने कहा, "इस संघर्ष में पाकिस्तान ने संदेशों के आदान प्रदान की भूमिका निभाई है. इसमें उसकी अपनी पहचान या कोई ऐसी भूमिका जो नतीजों को प्रभावित कर सके, जैसा एक मध्यस्थ करता है, वैसा नहीं दिखाई पड़ता. अभी तो इस मध्यस्थता का क्या अंतिम परिणाम निकलता है वो भी पता नहीं है. ये ज़रूर है कि पाकिस्तान ने दो देशों के बीच संदेशों के आदान प्रदान के माध्यम बनने के रूप में मध्यस्थता की कोशिश की, जिससे युद्धविराम संभव हुआ. लेकिन इससे ज़्यादा कुछ परिणाम दिखता नहीं."
उनके अनुसार, "एक सवाल ये भी है कि पाकिस्तान ऐसा क्यों कर रहा है. दरअसल, ऑपरेशन सिंदूर के समय से ही पाकिस्तान ने अमेरिका के क़रीब आने की कोशिश की है. उसने ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार दिए जाने की पैरवी की. आसिम मुनीर जब अमेरिका गए तो उस दौरान पाकिस्तान ने रेयर अर्थ मिनरल्स बेचने की बात की. तो पाकिस्तान ये लगातार कोशिश कर रहा है कि एक समय में अमेरिकी विदेश नीति में जब वो हाशिए पर था, अब फिर से उसकी भूमिका बढ़े. मौजूदा मध्यस्थता उसी से जोड़कर देखा जाना चाहिए."
पूर्व विदेश सचिव निरूपमा मेनन राव ने एक्स पर एक लंबे लेख में युद्ध विराम पर टिप्पणी करते हुए लिखा, "पाकिस्तान की भूमिका मध्यस्थ के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे माध्यम के रूप में उभरी है जिसके द्वारा संदेश पहुंचाए गए, समय सीमा बढ़ाई गई और एक छोटा राजनयिक चैनल खोला गया."
हर्ष पंत की तरह उनका भी मानना है कि 'यह पारंपरिक अर्थों में मध्यस्थता नहीं है, लेकिन इसके महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता.'
निरूपमा राव कहती हैं, "भारत को अपना रुख़ स्पष्ट करना चाहिए. उसे युद्धविराम का समर्थन करना चाहिए. उसे समुद्री मार्गों की रक्षा के लिए काम करना चाहिए और इस युद्ध में किसी एक पक्ष के प्रभुत्व को रोकना चाहिए. यह चुप रहने का समय नहीं है. यह समझदारी और बुद्धिमत्ता से बोलने का समय है."
उन्होंने लिखा, "पाकिस्तान की सफल युद्धविराम वार्ता इस बात का प्रमाण है कि उसे न केवल अमेरिका और ईरान का, बल्कि चीन का भी भरोसा हासिल है. मोदी पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करना चाहते थे, लेकिन इसके उलट, भारत खुद ही अलग-थलग पड़ गया है."
हर्ष पंत का कहना है कि पाकिस्तान ऐसा पहले भी कर चुका है. शीत युद्ध के दौरान 1970 में उसने रूस और अमेरिका के बीच ऐसी मध्यस्थता की थी. अमेरिकी विदेश नीति में अहमियत पाने के लिए वो ऐसा करता रहा है और उसे इसमें सफलता मिली भी है.
वो कहते हैं, "लोग भूल जाते हैं कि एक समय जब काबुल में तालिबान की सरकार बनने वाली थी तो भारत में कितनी चिंता ज़ाहिर की जाती थी कि भारत की विदेश नीति फेल हो गई, लेकिन नतीजा क्या हुआ? तालिबान आज भारत से बात कर रहा है और पाकिस्तान से लड़ रहा है. असल में विदेश नीति को लॉन्ग टर्म में देखना चाहिए."
इमेज स्रोत, AFP via Getty Images
'भारतीय विदेश नीति में काफ़ी संयम बरता गया'
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई जानकारों का कहना है कि कि भारत ने इस जंग में बहुत संयम बरता है.
बीबीसी के पॉडकास्ट कार्यक्रम दिनभर में बात करते हुए बीबीसी हिन्दी के संपादक नितिन श्रीवास्तव ने इसके पीछे एक बड़ी वजह अमेरिका के साथ ट्रेड डील को बताया.
उन्होंने कहा, "जब ईरान और अमेरिका-इसराइल के बीच जंग शुरू हुई, उस समय भारत की डिप्लोमेसी बहुत नाज़ुक दौर में थी. क्योंकि भारत लंबे समय से अमेरिका के साथ टैरिफ़ पर बातचीत कर रहा था. उसमें कई जटिलताएँ थीं. पहले टैरिफ़ 25 प्रतिशत था, फिर रूस से तेल लेने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरफ़ लगा. ईरान जंग के समय भारत अमेरिका के साथ एक बड़े ट्रेड डील के बीच था."
"ईरान से भारत के संबंध लोगों के स्तर पर बहुत बेहतर रहे हैं. भारत और ईरान के बीच आयात निर्यात का भी एक बड़ा बिज़नेस है, भारत से ईरान को बहुत सारी चीज़ें एक्सपोर्ट होती हैं, जिसमें बासमती चावल है. दूसरी ओर ईरान से बहुत सारी चीज़ें आती रही हैं, जैसे खनिज पदार्थों के अलावा, गैस पाइपलाइन की भी बात है, जिसमें भारत का काफ़ी निवेश है."
दरअसल ईरान युद्ध शुरू होने के ठीक पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसराइल की यात्रा की थी.
इसके ठीक बाद ये लड़ाई शुरू हुई. इसके कारण भी मोदी सरकार पर सवाल उठे.
जब ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई मारे गए, तब भारत की तुरंत प्रतिक्रिया नहीं आई.
लेकिन इसके कुछ दिनों बाद भारत के विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किया.
भारत इस मामले पर शुरू से कहता रहा है कि जंग रुकनी चाहिए लेकिन इससे ज़्यादा इस जंग में उसकी कोई भूमिका नहीं रही है.
इसके बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मध्य पूर्व देशों के कई नेताओं से लगातार बातचीत की. इनमें ईरान के राष्ट्रपति और ईरान के विदेश मंत्री भी शामिल थे.
नितिन श्रीवास्तव कहते हैं, "जहाँ तक भारत की विदेश नीति का सवाल है तो संघर्ष विराम की घोषणा से पहले दो सप्ताह में उसे तब सफलता हासिल हुई थी जब ईरान से बात करके उनकी रज़ामंदी से भारत को आने वाले तेल टैंकरों को होर्मुज़ स्ट्रेट से भारतीय नेवी की निगरानी में सुरक्षित लाया गया. ये ऐसे समय हुआ जब भारत ख़ुद संकट की ओर बढ़ रहा था और पीएम मोदी ने संसद में चिंताजनक स्थिति होने की बात कही थी."
उनके मुताबिक़, इस लिहाज से भारत की विदेश नीति में काफ़ी संयम बरता गया है और काफ़ी कुछ सफलता भी अर्जित हुई.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
टॉप स्टोरी
ज़रूर पढ़ें
सबसे अधिक लोकप्रिय
सामग्री् उपलब्ध नहीं है